सारंगढ़ बिलाईगढ़ :वनों की ‘कब्र’ पर पीएम आवास का सपना?सारंगढ़-बिलाईगढ़ में रक्षक ही बने भक्षक!बिलाईगढ़ वन परिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक 442 में ‘कत्लेआम’: 46 कीमती पेड़ों पर चली आरी, जेसीबी से मिटाए जा रहे वजूद के निशान…
सारंगढ़-बिलाईगढ़।
कहने को तो जिला 60% वनों से आच्छादित है, जहाँ साल, सागौन और बीजा के वृक्ष आसमान को छूते हैं। लेकिन वर्तमान में ये वृक्ष आसमान नहीं, बल्कि वन विभाग के भ्रष्टाचार की पाताल लोक जैसी गहराइयों को देख रहे हैं। सारंगढ़ वन मंडल के अधिकारी और कर्मचारी ‘गांधी के तीन बंदरों’ की भूमिका में हैं—आंखें मूंद ली हैं ताकि कटते जंगल न दिखें, कान बंद हैं ताकि गिरते पेड़ों की चीख न सुनाई दे, और जुबान सिली है ताकि मिलीभगत का सच बाहर न आए।
सर्जिकल स्ट्राइक की तरह हुई अवैध कटाई
23 जनवरी 2026 की तारीख बिलाईगढ़ वन परिक्षेत्र के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज हो गई। सर्किल गाताढ़ी के कक्ष क्रमांक 442 में किसी युद्ध स्तर की तैयारी के साथ 46 विशालकाय हरे-भरे पेड़ों को धराशायी कर दिया गया।
हथियार: आधुनिक चैन सॉ मशीनें।
लॉजिस्टिक्स: मौके पर ट्रैक्टर और जेसीबी की मौजूदगी।
आंकड़े-
50 सेमी से लेकर 160 सेमी तक की गोलाई वाले साजा, बीजा, धौवड़ा और सेन्हा के वृक्षों को काट दिया गया।
ग्रामीणों के सूचना देने के घंटों बाद ‘कुंभकर्णी नींद’ से जागे वन परिक्षेत्राधिकारी और बीट गार्ड मौके पर पहुंचे, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर संदेह की गहरी लकीरें खिंच गई हैं।
साजिश: जंगल साफ करो, पट्टा पाओ!
यह सिर्फ लकड़ी तस्करी का मामला नहीं है, बल्कि एक गहरी भू-माफियाई साजिश है। सूत्रों की मानें तो पेड़ों को काटने के बाद जेसीबी से जमीन को समतल किया जा रहा है।
खेल सीधा है:
जंगल उजाड़ो: कीमती लकड़ी बेचकर जेब भरो।
जमीन कब्जाओ: समतल भूमि को खेत का रूप दो।
सरकारी सेंधमारी: रसूख के दम पर उसी जमीन पर ‘प्रधानमंत्री आवास’ स्वीकृत करवाओ और अंततः मालिकाना हक (पट्टा) हासिल कर लो।
”क्या प्रशासन इतना अंधा हो चुका है कि आरक्षित वन क्षेत्र में निर्माण कार्य और खेती की तैयारी उसे नजर नहीं आती? यह भ्रष्टाचार का घी पीकर कंबल ओढ़ने जैसा है।”
— स्थानीय पर्यावरण प्रेमी
डीएफओ की सख्ती, पर क्या नीचे सब दुरुस्त है?
हाल ही में बिजली विभाग द्वारा 52 पेड़ों की अवैध कटाई पर डीएफओ विपुल अग्रवाल ने पत्र जारी कर हड़कंप मचा दिया था। लेकिन सवाल यह है कि जब विभाग के अपने ही जमीनी कर्मचारी (बीट गार्ड, डिप्टी रेंजर) संदिग्ध भूमिका में हों, तो केवल कागजी पत्रों से जंगल कैसे बचेंगे?
अंतिम सवाल: रक्षक या भक्षक?
विभागीय विफलता का आलम यह है कि संगठित गिरोह ट्रैक्टर और जेसीबी लेकर जंगल में घुस जाते हैं और विभाग को ‘भनक’ तक नहीं लगती।
क्या बिलाईगढ़ वन परिक्षेत्राधिकारी और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की जवाबदेही तय होगी?
क्या इन 46 वृक्षों की बलि देने वालों के पीछे के असली ‘आकाओं’ को पकड़ा जाएगा?
या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा?
जनता और पर्यावरण प्रेमी अब मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर देख रहे हैं। अगर अब भी ठोस कार्यवाही नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब सारंगढ़-बिलाईगढ़ के नक्शे से ‘हरा रंग’ पूरी तरह गायब हो जाएगा।


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