नई दिल्ली। पापमोचनी एकादशी का व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। यह व्रत करने से साधक को सभी पापों से मुक्ति मिल सकती है।

अगर आप भी एकदाशी व्रत करते हैं, तो इसकी कथा का पाठ जरूर करें। चलिए पढ़ते हैं पापमोचनी एकादशी की व्रत की दिव्य कथा।
पापमोचनी एकादशी कथा
प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक बहुत ही सुंदर वन था, जहां मेधावी ऋषि (महर्षि च्यवन के पुत्र) कठिन तपस्या में लीन थे। एक दिन गंधर्वों के राजा चित्ररथ उस वन में आए। उनके साथ उनकी अप्सराएं भी थी, जिसमें से एक थी मंजुघोषा, जो अत्यंत सुंदर थी। उसकी नजर तपस्या में लीन मेधावी ऋषि पर पड़ी और उसने अपनी सुंदरता और मधुर संगीत से ऋषि को आकर्षित करने का निश्चय किया।
कामदेव की सहायता से वह अपने प्रण में सफल रही और ऋषि मेधावी अपनी तपस्या छोड़कर मंजुघोषा के प्रेम में पड़ गए। प्रेम में पड़कर ऋषि अपनी साधना और समय का बोध पूरी तरह भूल चुके थे। मंजुघोषा के साथ ऋषि 57 वर्ष तक रहे, जिससे उनका तप नष्ट हो गया।
ऋषि ने दिया यह श्राप
जब मंजुघोषा ने ऋषि से स्वर्ग वापस जाने की अनुमति मांगी, तब ऋषि को यह एहसास हुआ कि अप्सरा के कारण उनकी बरसों की तपस्या नष्ट हो गई है। तब उन्होंने क्रोध में आकर मंजुघोषा को ‘पिशाचिनी’ बनने का श्राप दे दिया। मंजुघोषा अपने अपराध के लिए ऋषि मेधावी से क्षमा-याचना करने लगी। जब ऋषि का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने बताया कि “चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से तुम्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल जाएगी और तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।”
च्यवन ऋषि ने दी यह सलाह
अपने तप के खंडित होने से ऋषि मेधावी दुखी थे और वह सहायता के लिए अपने पिता च्यवन ऋषि के पास पहुचे। च्यवन ऋषि ने उन्हें भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। पापमोचनी एकादशी के प्रभाव से मंजुघोषा को पिशाचिनी योनि से मुक्ति मिल गई और वह पुनः अपने दिव्य रूप में लौटकर स्वर्ग को चली गई। वहीं पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से मेधावी ऋषि के पाप भी नष्ट हो गए।
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