रायगढ़: सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपराध, समाज ने रोका तो घर मे दफनाना पड़ा शव….
प्रतिष्ठा और जाति के नाम पर अपराध लगातार सामने आ रहे हैं। प्रदेश में सख्त कानून नहीं होने के कारण इस पर रोक नहीं लग रही है। जिले में दो साल के भीतर ऐसे 10 से अधिक मामले आए हैं, जिस पर कार्रवाई नहीं हुई। जाति और समाज के साथ ही सरकारी दफ्तरों में भी भेदभाव के मामले चिंता में डालने वाले हैं। सामाजिक संगठन कट्टर धार्मिक, जातिवादी और पितृ सत्तात्मक ताकतों द्वारा संस्कृति, परम्परा और प्रतिष्ठा के नाम पर जारी अपराध व सामाजिक आर्थिक बहिष्कार से निपटने कानून बनाने एकजुट हो रहे है।
धरमजयगढ़, सारंगढ़ विधायक के साथ कई विधायकों ने प्रतिष्ठा संबंधी अपराध से निपटने के लिए सख्त कानून बनाने की मांग करते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। जून 2016 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने सामाजिक बहिष्कार सामाजिक या जाति की प्रतिष्ठा के नाम पर होने वाले अपराधों को रोकने विधेयक लाया था। इसके लिए विधि विभाग, समाजशास्शत्री और अन्य लोगों को मिलाकर एक समिति भी बनाई थी। दोषी पाए जाने पर सात साल की सजा और पांच लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान था। विधेयक को सदन में रखने से पहले दावा आपत्ति मंगाई गई और राजनीतिक दबाव में विधेयक सदन में नहीं रखा गया। अब एक बार फिर ऐसे अपराधों को रोकने के लिए विधेयक लाने की तैयारी चल रही है। इस मुद्दे को लेकर प्रदेश के 20 से अधिक सामाजिक संगठनों की 2 सितंबर को संगोष्ठी भी हो चकी है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक पिछले 10 सालों में सिर्फ 540 अपराध दर्ज हुए हैं। जिले में अधिकांश प्रतिष्ठा आधारित और सामाजिक, आर्थिक बहिष्कार जैसे अपराध का रिकार्ड भी उपलब्ध नहीं है, जबकि जिले में ऐसे अपराधों से जुड़े 3 से ज्यादा प्रकरण हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं। सख्त कानून नहीं होने के कारण पुलिस लाचार है, कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाता।
पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष डिग्री चौहान बताते हैं कि 10 सालों में विभिन्न संगठनों द्वारा रिकार्ड किए गए मामलों के मुताबिक ऐसे अपराधों की संख्या 50 हजार से अधिक है। रायगढ़ जिले में एक भी मामले में सजा नहीं हुई है । महाराष्ट्र को छोड़कर देश में ऐसे अपराधों को रोकने के लिए कोई सख्त कानून नहीं है। ला कमीशन ने अलग कानून बनाने
की सिफारिश की है। “अंतरजातीय विवाह या सामाजिक बहिष्कार जैसे अपराध से निपटने के लिए विशेष कानून नहीं है। पुलिस के समक्ष कोई भी शिकायत आती है तो यह देखना होता है कि अपराध किस अधिनियम या धारा का उल्लंघन है। परिवार या सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर हुए अपराध की शिकायत पर सख्त कार्रवाई के लिए ऐसा कानून लाना जरूरी है।
कानून बने तो ही ऐसे मामलों में पुलिस सख्ती बरत सकती है और कोर्ट सजा दे सकती है। विजय सराफ, वरिष्ठ अधिवक्ता बरमकेला के हिंदू युवक ने सूरजपुर निवासी मुस्लिम युवती से एडीएम कोर्ट मैरिज 3 नवंबर 20 को आवेदन दिया। दोनों थानों की पुलिस से प्रतिवेदन मिल गया, इश्तेहार समेत तमाम नों की पुलिस से प्रतिवेदन मिल गया, इश्तेहार समेत तमाम औपचारिकता पूरी हो गई। पहले प्रकरण लंबित बताया गया, फिर दो पेशी में हाजिर नहीं होने की बात कहकर आवेदन निरस्त कर दिया गया। दोनों परिवार के लोगों ने कोर्ट आकर कहा कि उन्हें शादी से कोई आपत्ति नहीं है, फिर भी अफसर ने इनकार कर दिया। 3 दिसंबर 21 को कलेक्टर से शिकायत की लेकिन निराकरण नहीं हुआ। अगस्त के मध्य में औरदा पुसौर में धोबी समाज के युवक गुलाब ने आदिवासी ईसाई युवती से प्रेम विवाह किया।
समाज ने युवक के परिवार पर जाति को अपमानित करने वाले कृत्य करने का आरोप लगाकर बहिष्कार किया। फैसला किया कि 50 हजार रुपए का जुर्माना दें तो समाज में शामिल किया जाएगा। गरीब परिवार से समाज ने बात व्यवहार बंद कर दिया है। परिवार वाले थाने गए, पुलिस ने कानून नहीं होने के कारण एफआईआर दर्ज नहीं की। 9 अगस्त 21 को मालखरौदा के छपोरा (तब जांजगीर चांपा, अब सक्ती जिला) में बुधराम बघेल (सतनामी) की मौत हो गई। परिजन गडढा खोदकर दफनाने की तैयारी चल रही थी। यहां सतनामी समाज के ही 10 12 लोग आ गए। उन्होंने बुधराम का अंतिम संस्कार करने नहीं दिया। परिजन शव को घर ले गए और अपने आंगन में दफनाया। बुधराम और उनके खानदान के कुछ लोग ईसाइयों के साथ उनकी धर्मसभा में गए थे। उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया था, लेकिन समाज के ही लोगों ने उसका बहिष्कार किया।
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