नक्कार खाने की तूती ना बन जाये आदिवशियो की आवाज..नितिन सिन्हा

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दुनिया में कथित आधुनिक मानव सभ्यता के विकास की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे है आदिवासी।।

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हर साल की तरह इस साल भी आज 9 अगस्त 2021 को विश्व-आदिवाशी दिवस मनाया जाएगा..देश भर में बड़े -बड़े कार्यक्रम आयोजित किये जायेगे. यहां कुछ साधन-संपन्न स्वयम्भू आदिवासी नेता संगठित होकर संघर्ष करने और अपने अस्तित्व की रक्षा की बात वगैर कहेंगे..

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देश प्रभावशाली राजनैतिक पार्टियों के छोटे-बड़े नेता खुद को आदिवासियों के सबसे बड़ा हितैषी बताने से भी नही चूकेंगें।। यही नही आदिवासियों के विकास की बड़ी-बड़ी बातें भी उनके द्वारा कही जाएंगी ..

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पर क्या धरातल में ऐसा होगा भी ..शायद नही.आज के बाद अगले 364 दिनों के लिए फिर ये आवाजे गूम हो जायेगी.कल से फिर तमाम राजनीतिक दल के नेताओं व स्वयम्भू आदिवासी प्रमुखों के अलावा देश के पूंजीपति लोगों के लिए यही आदिवासी जन और उनके रहवास का क्षेत्र(जंगल और गांव)कथित सभ्य समाज के विकास की सबसे बड़ी बाधा बन जायेंगे।। देश के अति पिछड़े इलाकों में तमाम अभावों के बीच बमुश्किल अपनी जरूरतों को पूरा कर पाने वाला हर दूसरा आदिवासी इन्हें नक्सली नजर आएगा।

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फिर कोई हथियार बन्द प्रभावशाली इन्हें झूठे अधिकार दिलाने के नाम पर मारेगा या मरवायेगा या फिर दूसरा साधन-सम्पन्न वर्ग अपनी कभी न खत्म होने वाली भूख(विकास)के नाम पर अपने बेजाअधिकारों का प्रयोग इन बेबस,लाचार और सीधे-साधे लोगों पर करेगा..जरा सोंचिये दुनिया की सबसे प्राचीन संस्कृति के धारक मूल निवासी जिन्होंने कभी सभ्य कहे जाने वाले हम इंसानों के पूर्वजों को उनके विकास के लिए सहर्ष अपने अधिकार वाले क्षेत्र(जल,जंगल और जमीन)दे दी थीं। जिसे हमने सीमेंट के जंगलों और कूड़े-करकटों के ढेर में बदल दिया और आज इतनी बड़ी आबादी खड़ी कर दी कि अब हम उनके विकास के लिए बचे-खुचे गांवों और जंगलों को आदिवासियों से छिनने में लग गए हैं।। परिणाम स्वरूप आज के विशालकाय सभ्य मानव सम्राज्य के सिर्फ 15 प्रतिशत हिस्सों में सिमट कर रह रहे,हमारी 7.7 अरब की मानव जनसंख्या वाली दुनिया के बीच में महज 37 करोड़ आदिवासी ही शेष बचे है। जो वास्तव में आज भी हमसे अपने अस्तित्व और विरासत में मिली अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऊपर से आधुनिक मानव सभ्यता के कथित विकास के नाम पर दुनिया भर में हम सु-सभ्य और सु-शिक्षित लोग न केवल पूरी निर्ममता से या तो आदिवासियों की हत्याएं कर रहे हैं,या उनसे उनके रहवासी साधन और क्षेत्र *(जल,जंगल और जमीन)* छिनने में लगे है।।आज बहुत से बुद्धिजीवियों का कहना है कि बीते कुछ दशकों में जिस तरह से दुनिया भर में आदिवासियों की प्रताड़नाएं,हत्या और उनका बल या प्रलोभन पूर्वक धर्म-परिवर्तन की घटनाएं बढ़ी हैं,उन्हें देखकर तो यही लगता है कि आने वाले कुछेक दशकों में ही हमारे आदिवासी भाई-बहन और उनकी महान संस्कृति *”पुरखौती मुक्तांगन”* जैसी किसी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय म्यूजियम का हिस्सा बन कर रह जाएंगीं।।

ऐसे में नकली मुस्कानों के साथ झूठी बधाई संदेश देकर “विश्व आदिवासी दिवस” को मनाने के ढोंग से तो बेहतर होगा कि हम प्रकृति के सच्चे उत्तराधिकारियों को उनकी आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी जीवन शैली के साथ उनके ही क्षेत्र में सुरक्षित छोड़ दें।। हां हो सके तो उन तक उनकी ही जगह पर उनकी मानवीय जरूरतों के साधन-संसाधन ईमानदारी से पहुंचाते रहें।।.उन्हें आधुनिक शिक्षा और साधन तो दे पर बदले में उन्हें उनकी संस्कृति और परंपराओं से अलग ना करें।। सही मायनों में तब जाकर “विश्व आदिवासी दिवस की सार्थकता सिद्ध हो पाएगी”..

*अन्यथा नक्कार खाने में रोजाना अनेको बार तूतियां बजती है,पर उस पर ध्यान कोई नही देता और उनकी आवाजें भी कुछ क्षणों बाद वहीं खो कर रह जाती है..*

विश्व मूल निवासी दिवस 9

अगस्त की शुभकामनाएं…💐💐🙏

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