सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने वाले शहीद सैनिक मंगल पांडे हमारे हीरो हो सकते है,तो तेज बहादुर और मनोज कुमार क्यों नहीं.. नितिन सिन्हा

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कोई भी जवान शौक से आत्महत्या नही करता साहब,सिस्टम में बैठे प्रभावशाली लोग ही इसके जिम्मेदार होते है..
सुजॉय मंडल

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फिरोजाबाद की घटना ने एक बार फिर बीएसएफ के जांबाज तेज बहादुर का प्रसंग याद दिला दिया..

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कुछ साल पहले मतलब वर्ष 2017 भारत पाक के बार्डर से सीमा सुरक्षा बल के एक जवान का “जली हुई रोटी और पानी वाली दाल” का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था।

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जवान का नाम 42 वर्षीय तेज बहादुर यादव था, जो हरियाणा राज्य के महेंद्रगढ़ जिले के रहने वाला बताया गया था । श्री यादव वर्ष 1996 में बीएसएफ में भर्ती हुए थे। उन्हें जम्मू-कश्मीर स्थित राजौरी सेक्टर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के बिल्कुल निकट तैनात किया गया था। वीडियो में यादव ने आरोप लगाया था,कि सैनिकों को पिछले 10 दिनों से लगातार जली हुई रोटी और पानी पानी दाल खाने को दी जा रही है। यादव ने आरोप लगाया कि ऐसे में कई बार बल के जवानों को भूखा भी रहना पड़ रहा था। जवान के द्वारा उठाए गए गंभीर मुद्दे को लेकर पूरा देश उसके पक्ष में खड़ा नजर आया था। वीडियो वायरल होते ही उसे करीब एक करोड़ देशवासियों ने कुछ ही दिनों में देख लिया था। इस सनसनी खेज मामले को लेकर bsf बचाव की मुद्रा में आ गई थी। उसके पास तेज बहादुर को गलत साबित करने के अलावा कोई जवाब नही था। लेकिन बताया जाता है कि सोशल मीडिया में मिल रही प्रतिक्रियाओं को देखते हुए बीएसएफ के अलावा अर्धसेना और पुलिस के दूसरे बलों में भी जवानों के हिस्से का खाना भ्रष्टाचार कर खाने वाले सिस्टम के कीड़ों में खलबली मच गई थी।। जवानों को मिलने वाले राशन व्यवस्था में करीब 70 फीसदी सुधार हुआ था।। ठीक इसी तरह राशन व्यवस्था के अलावा भारतीय अर्धसेना और पुलिस बलों की दूसरी जरूरतों में भी बहुत हद भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया है।। फिर चाहे बल की तैनाती सीमा पर हो या नक्सल इलाकों में।। यहां भी जवानों को मिलने वाले राशन,वर्दी,जूते हथियार और अन्य युद्ध उपयोगी आवश्यक संसाधनों में सिस्टम की मार भारी है।। *9 अप्रैल 2014 चिंतागुफा छ ग सुजॉय मंडल प्रसंग अवलोकनीय है।। किस तरह कोबरा कमांडो सुजॉय मंडल को सिस्टम में व्याप्त खामियों के खिलाफ आवाज उठाना महंगा पड़ा था।। नक्सल आपरेशन में कोबरा के नियमों की अनदेखी,असफल रणनीति/सूचना तंत्र,ubgl का काम न करना से लेकर बैकप सपोर्ट की कमी जैसे मुद्दे उठाने पर सुजॉय बल से ही बर्खास्त कर दिए गए।।* परंतु सिस्टम में बदलाव नहीं लाया गया।। जिसका दुष्परिणाम कालांतर में सुकमा जिले के बुरकापाल,चिंतागुफा,बीजापुर में देखने को मिला।।

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रही बात राशन की तो ऐसा नही था कि तेज बहादुर ने जिस राशन मामले को लेकर अपनी आवाज बुलंद की थी,वो देश का पहला और आखिरी अकेला मामला था।। देश के सिस्टम को भ्रष्टाचार के कीड़ों ने इस हद तक खा लिया है,कि हर वर्ग और विभाग का प्रभावशाली इंसान अपने से नीचे और जरूर मंद दूसरे इंसान के हक का निवाला नोचने में व्यस्त हैं।। ऐसा नही है कि जरूरत मंदों को मिलने वाला राशन/साधन तथाकथित प्रभवाशाली वर्ग के लोगो के घरों या खेतों से आता है।। शासन की इस व्यवस्था को आमतौर पर भ्रष्टाचारी अपने बाप_दादा का माल समझ कर या तो अकेले या समूह में डकारने लगते है।।फिर जो कुछ बच जाता है उससे बहुतायत जरूरत मंद को पेट भरने के लिए दे दिया जाता है।।

देश में सिर्फ सेना,अर्धसेना,पुलिस बल में ही राशन के घपले का काम नही होता है,बल्कि सरकारी राशन दुकानों से लेकर, आंगनबाड़ियों,स्कूलों_आश्रमों,प्रशिक्षण केंद्रों,सरकारी अस्पतालों और तो और जेल में बन्द कैदियों के हिस्से का राशन भी सिस्टम के भ्रष्ट किंतु प्रभाव शाली कीड़े खा जाते है।। वस्तुत: इन जगहों में रहने वाले जरूरत मंद लोग इतने मजबूर होते है कि उनकी हिम्मत नही हो पाती कि वो सिस्टम के खिलाफ कुछ बोल पाएं।।

यदा कदा कोई बोलने का साहस भी करता है तो सालों से जरूरतमंदो का हिस्सा खा खाकर मजबूत हुए लोग उसे ही लील जाते हैं।। क्योंकि उनसे ऊपर बैठे लोग या तो कुछ करना ही नही चाहते या उस हिस्से में बराबर के भागीदार होते है।।

इस तरह सिस्टम में सुधार की अपेक्षा रखकर आवाज उठाने वाला साहसी व्यक्ति तेज बहादुर यादव या सुजॉय मंडल की तरह दबा दिया जाता है।। वैसे बताया जाता है कि जली रोटी और पानी दाल का मुद्दा उठाने वाले श्री यादव जो वर्ष 2019 में अनुशासन का हवाला देकर कर बर्खास्त कर दिए गए थे।। वो 2032 में रिटायर होने वाले थे।। तब आम आदमी और सेना के आम जवानों में किसी हीरो की तरह इमेज बनाने वाले तेज बहादुर को दूषित सिस्टम की सुनने वाली सरकार और सरकार के पोषित मीडिया वालों ने पाकिस्तानी जासूस तक करार दे दिया था।। इन सबके बावजूद सिस्टम और सरकार के कड़े दबाव को झेलने वाले तेज बहादुर और सुजॉय मंडल दोनो आज भी अपने उठाए मुद्दे को लेकर उत्साहित हैं।। उनका कहना है कि सिर्फ नौकरी करनी है इस मजबूरी की वजह से साथी जवान गलत का विरोध करने से हटें नहीं तो एक न एक दिन बदलाव जरूर आएगा।।

हालाकि सच कहा जाएं तो आज पांच साल बीतने के बाद भी सरकार ने देश के बड़े मीडिया घरानों को अपने चौखट में बांधने के अलावा सरकारी सिस्टम(व्यवस्था)में कोई विशेष बदलाव नहीं किया।। सब कुछ पुराने ढर्रे पर चल निकला।।

अर्धेसेना और पुलिस बल के जवान अनुशासन के नाम पर पुनः राशन और संसाधन दोनो के अभाव में कठिन सेवा करने को मजबूर हो गए।।
विगत चुनाव काल में हमने अपनी आंखों से देखा किस तरह अर्धसेना और पुलिस बल के जवानों ने दैनिक जीवन उपयोगी साधनों के अभाव में लगातार सेवा देते रहे।। छ.ग.,उप्र,बिहार और झारखंड में जवान सड़कों या फुटपाथों पर निम्न स्तर का भोजन करते दिखे।। उन्हें सेवा स्थल पर बैल गाड़ियों,इक्का गाड़ी,छगड़ा गड़ियो और छोटा हाथी(मिनी ट्रक)पर भेजा गया।। विश्राम के लिए जो भवन दिया गया वहां न तो बिजली की व्यवस्था थी, न ही पानी की।। एक कमरे में 40/50 जवानों को एक साथ रुकवाया गया।।
खैर पूरे देश ने इन अव्यवस्थाओं को अपनी आंखों से देखा।। सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात पर हुई कि एक तरफ देश के तमाम न्यूज चैनल चीख चीखकर ये बताते रहे कि मोदी सरकार ने देश के सैनिक और जवानों इस तरह की आधुनिक सुविधाएं और साधन प्रदान किया है।।
जिसे देखकर चीन और पाकिस्तान तो क्या अमेरिका भी बुरी तरह से कांपने लगा है।। इधर देश की सीमा के अंदर बिना सुरक्षा वाले टीन कनस्तर के डब्बों (पुराने वाहनों)में बैठकर ड्यूटी पर जाते एवम आतंकी हमले का शिकार होते दिखे।।

रही राशन व्यवस्था की बात तो मेरा दावा है कि खाने को लेकर आज भी देश के ज्यादातर पुलिस प्रशिक्षण केद्रों और कैंपों में स्थित मेस में खाने की गुणवत्ता निम्नतर ही मिलेगी।।

इस बात का प्रमाण राम राज्य u p फिरोजाबाद दबरई स्थित पुलिस लाइन में पदस्थ एक साहसी आरक्षी मनोज कुमार ने दिया है।। आरक्षक ने पुलिस लाइन के मेस से जवानों को मिलने वाले घटिया खाने का मुद्दा उठाया है।। ऐसा नही है कि उसने मसले को लेकर विभाग के अफसरों से बात नही की।।बकायदा उन्हें मेस से रोजाना मिलने वाली रोटी और दाल को खाकर देखने का निमंत्रण दिया,परंतु उसे भी अपेक्षित जवाब मिला शांत रहो नही तो नौकरी से जाओगे।। इसके बाद व्यथित जवान सड़क पर उतर आया और आम जनता के समाने मुद्दे को उठाते हुए हंगामा खड़ा किया।। जिसने भी जवान की बात सुनी और देखी वह उ प्र पुलिस की आंतरिक व्यवस्था को लेकर दो नाराजगी प्रकट की।। जवान मनोज 12 घंटे की कठिन सेवा के बाद मैस से नियमित मिलने वाले खाने और पुलिस कप्तान साहब की बेरुखी से परेशान था. वस्तुतः पुलिस विभाग के आला अफसर अपने विभाग के जवानों को इंसान मानने को तैयार नही है।। उनकी नजर में वह एक जीता जागता रोबोट है जिसे न तो भूख लगती है न प्यास।। जिसके अंदर कोई मानवीय भावनाएं नही होती।। जिसका कोई मानवाधिकार और आत्म सम्मान नही होता।।

ऐसे में व्यवस्था में सुधार हो न हो परंतु *पानी वाली दाल और चमड़े की तरह कड़ी सुखी रोटी* का मुद्दा उठाने वाले उ प्र पुलिस के जवान के साथ भी वही होना था जैसा तेज बहादुर और सुजॉय मंडल के साथ हुआ।। आम लोगों के सामने अपनी किरकरी होता देख विभाग के अफसर जवान को अपनी जीप में जबरन बैठाकर अन्यत्र ले गए।। अब अनुसासन के नाम पर जवान के साथ जो न किया जाए वो कम होगा।।

वैसे जानकार कहते है कि *इस तरह सिस्टम में काम करते हुए उसी के ख़िलाफ़ खड़े होने का दु:स्साहस आप तभी कर सकते हैं जब बात आपकी रोटी पर आ जाए या ज़िदगी पर*।।

वैसे आपको बताना चाहूंगा कि इसी तरह के भ्रष्ट और तानाशाह सिस्टम की वजह से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सुरक्षा में लगे सैकड़ों जवान( जो सुरक्षा बल और पुलिस में सेवारत हैं)मजबूरी में प्रतिवर्ष आत्महत्या करते हैं।।आत्महत्या के आंकड़े अगर आप जान जायेंगे तो आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।। ये अलग बात है कि देश की कोई भी सरकार और सिस्टम इस मुद्दे को गंभीर मानने को तैयार नही है।। क्योंकि उन्हें लगता है कि देश में बेरोजगारी इतनी है कि एक जवान के मरने पर उसकी जगह दस और युवा भरने चले आ आयेंगे।। और देश की जनता को अपना पेट भरने तथा जरूरत पूरा करने से फुरसत नहीं होगी वो भला सरकार से सवाल करने का जहमत भला क्यों उठाएगी।।।

हालाकि इस मुद्दे पर मेरा विचार बिल्कुल अलग है मैं सोंचता हूं, कि तब अंग्रेजी पलटन में रहकर सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने वाले *जवान मंगल पांडे देश के हीरो हो सकते हैं तो फिर सुजॉय मंडल,तेज बहादुर,पंकज कुमार,शेष नाथ पांडे,राकेश कुमार यादव और उप्र पुलिस का जवान मनोज कुमार हमारे हीरो क्यों नही हो सकते???*
बहरहाल मेरी तरफ से Up पुलिस के कांस्टेबल मनोज कुमार के जज्बे को सलाम

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