जितेंद्र तिवारी

खरसिया। माघ शुक्ल सप्तमी सोमवार को देवी महिमा सुना रहे आचार्य दीपककृष्ण ने जैसे ही जगतजननी और महादेव के पावन परिणय का प्रसंग सुनाया। वैसे ही नन्हे बालक-बालिका शिव-पार्वती और नंदी के वेश में व्यासपीठ के समीप पहुंचे। उन्हें देखते ही सभी श्रद्धालु भाव विभोर हो उठे। ऐसे में पूरे पांडाल में माता के जयकारे और हर हर महादेव के नारे गूंजने लगे।


कथाचार्य पंडित दीपककृष्ण ने कहा कि शिव अजन्मा एवं अविनाशी हैं। सारा जगत शिव का परिवार है और हर परिवार में वरिष्ठ सदस्य सदस्य के रूप में शिव विद्यमान हैं। जगत पिता महादेव पशुपतिनाथ हैं। देवता मनुष्य पशु तथा पिशाच सभी उनकी संतानें हैं। ऐसे में देवताओं के अतिरिक्त पशु-पक्षी, भूत पिशाच और डाकिनी शाकिनी भी शिव विवाह में सम्मिलित हुए थे। वहीं बताया कि रुद्रप्रयाग में स्थित त्रियुगीनारायण नामक एक पावन स्थान है। माना जाता है कि सतयुग में भगवान शिव ने माता पार्वती से यहीं विवाह किया था। यहां विवाह मंडप की अग्नि आज भी प्रज्वलित है। मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए त्रियुगी नारायण मंदिर से आगे गौरीकुंड कहे जाने वाले स्थान पर माता पार्वती ने तपस्या की थी। वहीं भगवान शंकर ने इसी मंदिर में माता पार्वती से विवाह भी किया था।
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