देश, तमनार और जनता की तरक्की की एक ही चाबी- “विधिवत ग्रामसभा”…बसंत कुमार पटनायक-पूर्व जनपद अध्यक्ष तमनार….

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रायगढ़। किसी देश किसी राज्य किसी क्षेत्र की जनता जब तक मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहीं हैं तो फिर वहां विकास की फेहरिस्त बेईमानी ही लगेगा। आज वैश्विक भुखमरी सूचकांक में 116 देशों में भारत 101 नंबर पर है, अर्थात टॉप से सोलहवें नंबर पर। भारत की आबादी और बिगड़ती अर्थव्यवस्था को देते हुए 5 से 10 वर्षों में सोमालिया को पछाड़कर भारत टॉप पायदान पर पहुंच जाए तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। भारत विश्व गुरु बने ना बने मगर विश्व गुरु बनने की राह पर इसका जिक्र होता रहे। क्या पता सौ बार बोला गया झूठ सच साबित हो जाए।

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संदर्भ यही है मगर आज हम यहां अपने क्षेत्र तमनार ब्लॉक/तहसील स्तर की बात कर रहे हैं। विगत कुछ वर्षों में जब से इस क्षेत्र में अनेक खदानों एवं औद्योगिक इकाइयों की स्थापना हुई परिणाम स्वरूप जो बदलाव हुए खासकर लोगों की सोच एवं नजरिए में वह गहन चिंतन का विषय है। चूंकि बदलाव की शुरुआत होशियार एवं चालाक व्यक्तियों से होती है क्योंकि वे वक्त की नजाकत नफा नुकसान और अनुकूल अवसर की उम्मीद में कभी भी यू टर्न ले लेते हैं। यहां का हाल भी ऐसा ही है। जैसे-जैसे उद्योगों में लोगों की निर्भरता बढ़ती गई अधिकांश लोगों का दैनिक कामकाज की गतिविधियां औद्योगिक इकाइयों में केंद्रित होती गई वैसे वैसे यू पॉर्न लेने वालों की एक जमात बनती चली गई। इसलिए बदलते परिवेश और बदलती भूमिकाओं में जनप्रतिनिधियों का वर्गीकरण करना आवश्यक हो जाता है। एक तो वे जो सीधे जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि, दूसरा समाजसेवी जनप्रतिनिधि और तीसरा तथाकथित जनप्रतिनिधि जो राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता व पदाधिकारी होते हैं।

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चूंकि तमनार क्षेत्र पांचवी अनुसूची लागू क्षेत्र के अंतर्गत आता है।जाहिर है औद्योगिक इकाइयों की स्थापना प्रभावित ग्रामों के ग्राम सभाओं की अनापत्ति/सहमति प्रस्ताव के बगैर संभव नहीं है। कोई भी कंपनी विधिवत ग्राम सभाओं का प्रस्ताव लेगी तो निश्चित रूप से उसे समस्त शासकीय प्रावधानों का परिपालन करना होगा। और मैं समझता हूं की पूरी ईमानदारी के साथ कोई कंपनी अपने दायित्वों का परिपालन करे तो कभी भी कोई बड़ा विवाद कंपनी और आम जनता के बीच नहीं होगा। मगर अधिकांश निजी कंपनियों को फर्जी प्रस्ताव लेना ही सही लगता है, और ऐसे फर्जी प्रस्तावों का समर्थन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सारा सिस्टम और सारे जनप्रतिनिधि करते रहे हैं। और यहां यह बताना लाजिमी होगा की निर्वाचित जनप्रतिनिधि और औद्योगिक इकाइयों के बीच मध्यस्थता में अहम रोल इन तथाकथित जनप्रतिनिधियों का होता है। अब तक यह सर्वविदित है की कुछ समाजसेवी जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन जनचेतना मंच के सदस्य जो इस क्षेत्र के लोगों को संगठित कर उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करते हुए स्थानीय लोगों की हक की लड़ाई में हमेशा साथ खड़े है, वरना इस क्षेत्र का क्या हाल हो चुका होता है इसकी कल्पना सहज की जा सकती है और इसका सबूत यही है की इस क्षेत्र में अंधाधुन अंधाधुंध औद्योगिक इकाइयों व खदानों की स्थापना तथा पूर्व लगे इकाइयों का लगातार विस्तार के बावजूद भी यहां का आलम पूरा बदहाल और लोग मूलभूत सुविधाओं और रोजगार के लिए तरस रहे हैं। इन सब के पीछे एक ही कारण है फर्जी ग्राम सभा और फर्जी प्रस्ताव। पूर्व में स्थापित कंपनियों के भू अर्जन प्रकरण में कई ऐसे परिवार हैं जिन्हें आज तक मुआवजा राशि प्राप्त नहीं हुआ कई प्रभावित परिवार आज भी रोजगार से वंचित है कितने परिवारों का विस्थापन हुआ पुनर व्यवस्थापन की क्या कार्यवाही हुई किसी संबंधित पंचायतों में कोई जानकारी नहीं है शासकीय भूमि (गोचर, पानी के नीचे की जमीन, अमराई,छोटे बड़े झाड़ के जंगल कोटवार सेवा भूमि आम निस्तारी भूमि) कैसे आम जनता के उपयोग के पहुंच से बाहर हो गए किसी को कोई पता नहीं चला। अच्छा खासा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा चुका है, नदी नाले तालाब प्रदूषित खो चुके हैं, आम रास्ता में चलना मुश्किल हो चुका है और ये अब तक जो हुआ हैं इससे कई गुना ज्यादा आगे होने की संभावना है।महाजेंको की जनसुनवाई राजनीतिक पार्टियों को बेनकाब करने के लिए काफी है। स्थानीय जनता और सामाजिक संगठनों के सहयोग से प्रभावित ग्रामों के लोगों द्वारा बृहद रूप से जनसुनवाई का विरोध किया गया किस-किस राजनीतिक पार्टी के लोग विरोध में जनता के साथ खड़े हुए कौन-कौन निर्वाचित जनप्रतिनिधि जनता की आवाज बने यह किसी से छिपी हुई नहीं है इसे सब ने देखा है। आए दिन राजनीतिक पार्टियां अपने पार्टी एजेंडे के अनुरूप धरना प्रदर्शन करते रहते हैं और अपने आप को जन हितेषी साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते लेकिन हकीकत तो यह है की जो जोश, उत्साह, गगनभेदी नारे, उत्तेजक भाषण, बयान बाजी दिखता है इसका जनहित से कोई खास वास्ता नहीं होता है। यह तो विपक्षी पार्टी को नकारा साबित करने और अपने आप को एक्सपोज करना यही मकसद होता है। काश स्थानीय जनता की जरूरत सुरक्षा एवं सुविधाओं को राजनीतिक पार्टियां इमानदारी पूर्वक अपने एजेंडे में शामिल कर ले तो ना कोई फर्जी प्रस्ताव पारित होता और ना ही स्थानीय लोगों को अपने हक व अधिकारों से वंचित होना पड़ता और न कोई कंपनी मनमानी कर पाता कोई दुस्साहस करता तो निश्चित रूप से सलाखों के पीछे होता। माननीय विधायक जी से निवेदन करता हूं की जब से इस क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना हुई है और जहां-जहां पर ग्राम सभा का प्रस्ताव कंपनियों द्वारा शासन को प्रस्तुत की गई है उसकी जांच करवाएं निश्चित रूप से कई चेहरे बेनकाब हो जाएंगे।

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(बसंत कुमार पटनायक-पूर्व जनपद अध्यक्ष तमनार)

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