लड़कों के कॉलेज में कुमुदिनी बाघ द्विवेदी ने अकेली पढ़कर बनाया मुकाम

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बिर्रा –श्रीमती कुमुदिनी वाघ द्विवेदी के मन में बचपन से ही शिक्षा के प्रति विशेष रूचि थी। उन्होंने 12वीं की पढ़ाई करने के बाद में कुछ कर गुजरने की तमन्ना लिए उन्होंने कॉमर्स लेकर पढ़ाई करने की ठानी। इस दौरान उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। क्योंकि उस समय कॉमर्स विषय के लिए जो कालेज मौजूद था वहां सिर्फ लड़के ही पढ़ते थे इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अकेली छात्रा के रूप में पढने लगी। मां बाप भी पढ़ाई करने के लिए हमेशा हर संभव सहयोग व प्रोत्साहित किए। बी कॉम नया विषय होने के कारण साथ ही कालेज के प्राध्यापक से भी उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के कारण वे एक विषय में पूरक आ गई। लेकिन बाद में बी काम व एम काम में उच्च नंबर लाकर उन्होंने सबको बता दिया कि कड़ी मेहनत और लगन से यदि कोई काम किया जाए तो इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं है। सफलता हासिल होने के पश्चात श्रीमती द्विवेदी अपने कालेज के प्राध्यापक के घर जाकर मिली और
पैर छूकर प्रणाम की और बतायी कि सर, एम.काम में अच्छे अंक लाने के कारण मुझे व्याख्याता के पद पर नियुक्ति मिली है यह सब आपकी विशेष कृपा आशीष से ही संभव हुआ है।
श्रीमती द्विवेदी को व्याख्याता पद पर प्रथम नियुक्ति गनियारी शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल में मिली थी जहां घर वालों ने रायगढ़ से आने-जाने की सुविधा नहीं होने के कारण नौकरी करने से मना कर दिया तब वह निराश हो गयीपर हार नहीं मानी। फिर उसने अपने पापा को लेकर संयुक्त संचालक ऑफिस बिलासपुर गई और वहां पर चांपा के लिए नियुक्त व्याख्याता से मुलाकात की और अपनी समस्या बताकर गनियारी स्कूल में काम करने के लिए आग्रह किया। जिसे वे मान गए और श्रीमती द्विवेदी की नियुक्ति संयुक्त संचालक महोदय बिलासपुर के द्वारा गनियारी की जगह चांपा हायर सेकेंडरी स्कूल व्यवसायिक पाठ्यक्रम में किया गया। इसी विद्यालय में सेवारत शिक्षक आरके द्विवेदी को उन्होंने अपना जीवन साथी के रूप में पाया। श्रीमती द्विवेदी को अपने पति आरके द्विवेदी से हर कदम में सहयोग व साथ मिला इस कारण वे अपने कार्य क्षेत्र में और तेजी से काम करते चले गई। और उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए वर्ष 2004 में महामहिम राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया। इस दौरान उन्होंने कई गरीब बच्चों का शुल्क वहन कर उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। सामाजिक गतिविधियों, साहित्य, कला, संस्कृति से जुड़ी श्रीमती द्विवेदी अखिल भारतीय कवियत्री एवं लेखिका के कर्तव्यों का भी बखूबी निर्वहन किया। उन्होंने बच्चों को संस्कारित शिक्षा, व्यवसायिक शिक्षा, प्रौढ शिक्षा, कुष्ठ आश्रम में सेवा व कमजोर बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
साक्षर भारत कार्यक्रम के तहत जिला परियोजना अधिकारी जांजगीर के रूप में उत्कृष्ट कार्य कर जिले में साक्षरता की दर को बढ़ाकर एक ग्रेड तक पहुंचाया।
श्रीमती द्विवेदी आज की युवा पीढ़ी को संदेश देते हुए कहती है कि आज के दौर में नारी होना गर्व की बात है।अब स्त्री एवं पुरुष में कोई फर्क नहीं रह गया है अब एक स्त्री वह सभी कार्य कर सकती है जो एक पुरुष कर सकता है।

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अब वह दिन लद गए जब महिलाओं का दायरा केवल घर की देहरी तक सीमित था। अब महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में न केवल आगे बढ़ रही है वरन अपनी महता भी साबित करते हुए यह दिखाने में सफल रही है कि वे किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है
कड़ी मेहनत, कुछ कर गुजरने और कुछ हटकर करने की तमन्ना सभी महिलाओं में होनी चाहिए।

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