छत्तीसगढ़:सिस्टम की बड़ी नाकामी : बारिश और बदइंतजामी से सड़ा करोड़ों का धान, संग्रहण केंद्र से एक साल बाद भी नहीं हुआ उठाव…

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किसानों के कड़ी मेहनत से तैयार हुआ धान बारिश और सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ गया। बस्तर जिले में खरीदी के करीब एक साल बाद भी 27,307 मीट्रिक टन धान आज तक संग्रहण केंद्रों में पड़ा हुआ है, लेकिन उसका समय पर उठाव नहीं हो पाया।

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नतीजा यह कि अब करोड़ों का धान सड़ने लगा है। हालात केवल बस्तर तक सीमित नहीं हैं। कवर्धा में 7 करोड़ का धान चूहों के खाने की बात सामने आई तो बस्तर में भी करोड़ों का धान खराब हो चुका है। हालांकि अधिकारी इससे इनकार करते रहे हैं। इन्हीं दावों की हकीकत जानने लल्लूराम डॉट कॉम की टीम जगदलपुर के नियानार संग्रहण केंद्र पहुंची। पढ़िए पूरी रिपोर्ट-

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संग्रहण केंद्र के गेट में प्रवेश करते ही सड़े हुए काले रंग के धान के ढेर दिखाई देने लगे। यह कोई नई किस्म का धान नहीं, बल्कि पूरी तरह सड़ चुका धान था, जो सड़ने के बाद काला पड़ गया है। हालात इतने खराब हैं कि धान ही नहीं, बल्कि उसे रखने वाले बोरे भी गल चुके हैं। अब मिलर्स सड़े बोरों से धान निकालकर दूसरे नए बोरो में भरकर उठाव कर रहे हैं। उठाव की अंतिम तिथि 31 जनवरी तय की गई है, लेकिन नियानार संग्रहण केंद्र में रखे 15,129 मीट्रिक टन धान का समय पर उठाव हो पाना मुश्किल नजर आ रहा है, क्योंकि सभी बोरे पूरी तरह खराब हो चुके हैं। सड़े बारदानों को अलग कर नए बोरो में पैक किया जा रहा है। यहां तक कि केंद्र के मुंशी ने मजदूरों से अच्छा और खराब दोनों तरह का धान मिलाकर बोरे में भरने कहा है।

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यह पहली बार नहीं है जब बस्तर में धान खराब हुआ हो। हाल ही में दंतेवाड़ा जिले में 30 हजार क्विंटल चावल खराब मिला, जिससे कई लोग राशन से वंचित हो गए। आशंका यह भी है कि यही खराब धान मिलर्स द्वारा चावल बनाकर सरकार को सौंप दिया जाएगा। फफूंद लगे इस धान से निकला चावल कितनी गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

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धान से निकला चावल राशन दुकानों तक पहुंचने योग्य नहीं : मिलर्स प्रतिनिधि

जब पूरे मामले पर जिला विपणन अधिकारी से बातचीत की कोशिश की गई तो उन्होंने इंटरव्यू देने से साफ इनकार कर दिया और केवल डेटा देने की बात कही। वहीं संग्रहण केंद्र में मौजूद मिलर्स प्रतिनिधि ने साफ तौर पर इसे शासन-प्रशासन की लापरवाही बताया। उनका कहना था कि समय पर डीओ जारी न होने के कारण धान का उठाव नहीं हो पाया, जबकि बारिश से पहले ही यह प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी। साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि धान को ढकने के लिए इस्तेमाल की गई घटिया गुणवत्ता की त्रिपाल भी धान खराब होने का बड़ा कारण है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस धान से निकला चावल राशन दुकानों तक पहुंचने योग्य नहीं रहेगा।

शासन-प्रशासन की लापरवाही से बड़ी मात्रा में धान खराब : मजदूर संघ

संग्रहण केंद्र में काम कर रहे मजदूर संघ का कहना है कि नियानार केंद्र में इतनी बड़ी मात्रा में धान पहली बार खराब हुआ है। उनका आरोप है कि शासन-प्रशासन की सीधी लापरवाही से किसानों की मेहनत मिट्टी में मिल गई। मजदूरों की चिंता यह भी है कि यही खराब धान से बना चावल आखिरकार आम लोगों की थाली में पहुंचेगा जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है।

मामले की जांच के लिए गठित की जाएगी टीम : अपर कलेक्टर

मामले की गंभीरता को देखते हुए संग्रहण केंद्र का निरीक्षण करने पहुंचे अपर कलेक्टर सीपी बघेल ने स्वीकार किया कि धान खराब हुआ है। उन्होंने बताया कि वे यह देखने आए हैं कि धान की नियमित पलटी हो रही है या नहीं। उन्होंने कहा कि सड़े बोरों से धान निकालकर अच्छे बोरों में शिफ्ट किया जा रहा है, लेकिन वे खुद भी इस बात से संतुष्ट नहीं हैं कि इस धान से बना चावल खाने योग्य होगा या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि खराब धान के भौतिक सत्यापन के लिए एक टीम गठित की जाएगी, जो जांच कर यह तय करेगी कि इतनी बड़ी मात्रा में धान खराब होने की जिम्मेदारी किसकी है।

निष्पक्ष जांच हो तो करोड़ों का घोटाला उजगार होगा : बैज

इस मामले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि यह स्थिति सिर्फ नियानार संग्रहण केंद्र तक सीमित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के गृह जिले में भी 6 करोड़ का धान खराब हुआ है, कवर्धा में 7 करोड़ का धान चूहे खाने की बात सामने आई है। दंतेवाड़ा में 18 करोड़ का चावल खराब होने का मामला है। बैज ने सवाल उठाया है कि यह वास्तव में चूहों का काम है या फिर एक बड़ा घोटाला है। बैज का कहना है कि अगर पूरे प्रदेश के संग्रहण केंद्रों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो करोड़ों के घोटाले सामने आ सकते हैं। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन अगर हर साल इसी तरह किसानों का धान सड़ता रहा तो यह कटोरा धीरे-धीरे खाली होता चला जाएगा और इसकी कीमत किसान से लेकर आम उपभोक्ता तक सभी को चुकानी पड़ेगी।

जगन्नाथ बैरागी
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