एक्सक्लुसिव न्यूज़- क्या सारंगढ़ के प्रशासनिक अधिकारियों पर लगा रहे आरोप पर लोगों को दिखाया जा रहा सिर्फ 1 पहलू…दूसरे पहलू में पढ़िए अपने ऊपर लगे आरोप पर क्या बोले तीनो अधिकारी….

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जगन्नाथ बैरागी

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रायगढ़-सारंगढ़ ब्लॉक में वर्तमान में एक ही बात की चर्चा जोरों पर है कि किस तरह तीन प्रशानिक अधिकारियों द्वारा एक आयुर्वेदिक डॉक्टर के क्लिनिक में जाकर उन्हें डरा-धमकाकर उनसे 5 लाख रुपये की मांग की जाती है। आयुर्वेद के माध्यम से सेवाभाव फलस्वरूप ईलाज करने वाले आयुर्वेद डॉक्टर द्वारा डर कर 3 लाख की राशि प्रशासनिक अधिकारियों को दी जाती है। घटना के कुछ दिन पश्चात अचानक पीड़ित को याद आता है कि 3 लाख की राशि बहुत बड़ी रकम है, जो कि एक गरीब के लिए सच मे बड़ी रकम है। इतना रकम तो वो पूरी जिंदगी मेहनत करके भी नही कमा सकता। क्योंकि आज के एलोपैथिक युग मे आयुर्वेद डॉक्टर के पास अभी कोरोनकाल को छोड़ दें तो इक्के-दुक्के(बहुतकम)व्यक्ति ही ईलाज हेतु आते है..! 3 लाख की बड़ी राशि देने के पश्चात पीड़ित आयुर्वेदिक डॉक्टर को 10 दिन पश्चात अहसास होता है कि उसके साथ बहुत गलत किया गया,इस अन्याय और उसके साथ किये गये अपमान से जीने की इच्छा ख़तम हो जाती है और मीडिया के समक्ष अपने साथ घटित-घटना को पहले बताता है, उसके दूसरे दिन थाने में जाकर आवेदन देता है।

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आवेदन के अनुसार बीएमओ,तहसीलदार,और थाना-प्रभारी द्वारा उसके टीवी,पंखा,एसी, कुर्सी को जप्त करो कहकर धमकी दी जाती है..ऐसा पंखा, कुर्सी की जप्ती बहुत से लोगों ने पहली बार सुनी होगी खैर..टीवी पंखा की जप्ती सुनते ही पीड़ित डॉक्टर की सांसें फूलने लगती है..!इतने में तहसीलदार द्वारा मोबाईल छीन लिया जाता है और सीसीटीवी के बारे में पूछा जाता है तभी पीड़ित द्वारा कहा जाता है कि केबिन के अलावा सब जगह सीसीटीवी है उतना में डॉक्टर और ज्यादा डर जाता है और पीड़ित डॉक्टर 50000 रुपये देने की पेशकश करता है उसपर अधिकारीयों द्वारा 3 लाख की मांग की जाती है। इस पर पीड़ित और डरे हुवे डॉक्टर को अपने छोटे बच्चों,बूढ़ी मा,और परिवार की चिंता होती है और तत्काल घर से 2.5 लाख,और मेडिकल से 50 हज़ार लाकर अधिकारियों को देता है। फिर पीड़ित के अनुसार एक अधिकारी सीसीटीवी के फ़ुटेज को डिलीट कर देता है। खैर मामले के कुछ दिन बाद बीएमओ को फोन कर 3 लाख की राशि बहुत बड़ी होती है कहकर पीड़ित डॉक्टर द्वारा फोन किया जाता है जिसमे बीएमओ द्वारा तथाकथित ऑडियो में कहा जाता है कि ठीक किये आप बीच का रास्ता निकाल लिए वरना आपके विरुद्ध जो शिकायत थी उसमें पूरी तरह फंस जाते..पीड़ित डॉक्टर कहता है की आगे से जब भी ऐसा कुछ होगा तो पहले से मुझे जानकारी दे देना तो फोन के ऑडियो में दूसरे पक्ष से कहा जाता है कि ये प्रशानिक ग्रुप में आया था वरना मैं किसी डॉक्टर को क्यों मुसीबत में डालता। कितना दिए हो मुझे पता नही अगर 3 लाख है तो बहुत बड़ी राशि है अगर आपको गलत लगता है तो आप सम्बंधित के ख़िलाफ़ केश कर सकते हैं। पीड़ित द्वारा कहा जाता है कि ऐसे में तो कल सीएमओ किसी को भी भेज देगा चेक करने तो कैसे करूँगा। उधर से आवाज़ आती है ठीक किये जो आपने बीच का रास्ता निकाला लेकिन जो कमी है उसे पूरी करो,किसी एमबीबीएस डॉक्टर को पंजीकृत कर लो इस पर डॉक्टर कहते हैं कि उनके कोई चाचा हैं महासमुंद में उनको बुलाऊँगा, इस कोरोनकाल मे लक्षणयुक्त मरीज का ईलाज न करने की बात भी बीएमओ द्वारा कही जाती है, और बार बार कमी पूरा करने और भविष्य में गलती न दोहराकर आगे बढ़ने की बात कही जाती है…
(नोट-हम इस बात की पुष्टि नही करते कि बात किनके-किनके बीच हुवी है, हम प्राप्त ऑडियो के अनुसार बता रहे हैं)

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तीन अधिकारियों पर लगे बेहद ही संगीन आरोप के आधार पर हमने जब तीनो से बारी-बारी पूछा तो निम्न बात सामने आयी-

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क्या कहते हैं बीएमओ सिदार

कमी पाई गई थी,नोटिस दिया गया है।एक कोविड मरीज का वारे क्लीनिक में डेथ हुवा था और एक का बिना एंटीजन टेस्ट के ईलाज किया गया था तो उसी के जांच में गए थे। उनके पास आयुर्वेदिक का पंजीयन है,और ईलाज एलोपैथिक से कर रहा था।भर्ती करने का अधिकार नही है सिर्फ क्लीनिक का परमिशन लिया है। वारे क्लीनिक पंजीकृत था, इसलिए पूरी जांच किये बिना हम कैसे सील बन्द कर देते?..पंजीयन किस आधार पर दिया गया है सबकी जांच किया जा रहा है इसके लिए रायपुर रजिस्ट्रार से बात किया गया है, पंजीयन में भी कई खामियां,त्रुटियां हैं। गाव वालों के अनुसार प्रैक्टिस इनके द्वारा 2005-06 से अर्थात डिग्री लेने से पहले ही किया जा रहा है। और इनके द्वारा दिल्ली से सर्टिफिकेट 2013 में लाया गया है। और उसी सर्टिफिकेट के आधार पर 2014 में रायपुर से पंजीयन करवाया है।उसी आधार पर जिला से नृसिंग होम का पंजीयन मिल गया आयुर्वेद का इसकी जंच का विषय काफी लंबा है।पूरी तरह एथेंटिक जांच न हो जाये नही बता सकता पूरी बात…
हम जो मृत्यु हुवी है उसकी जांच करने गए थे, कोविड पॉजिटिव पेशेंट का एक डेथ हुवा था इनके(डॉक्टर वारे) द्वारा रेडा की 23 वर्षीय बालिका का कोविड-19 के मरीज को बिना एंटीजन,आरटीपीसीआर टेस्ट के सामान्य शर्दी,खासी का मरीज समझ के ईलाज किया गया था। और मेरी जानकारी में एक बात और आयी है कि किसी कोविड पेशेंट को भी भर्ती करके ईलाज किया है..लेकिन उसका रिकॉर्ड अभी देखा नही हूँ। इन सब चीज को छुपाने के लिए आरोप लगा रहा है। जांच अधिकारी मेडम गरिमा द्विवेदी को नियुक्त किया गया है।इसके बाद सब सच्चाई आप सब तक पहुंच जायेगी।

क्या कहना है तहसीदार अग्रवाल का-

वहां गए थे तो वो एलोपैथीक प्रैक्टिस कर रहा था,इंजेक्शन मेडिसिन सब एलोपैथिक के थे। हमने बीएमओ साहब को पूछा तो उन्होंने बताया कि ये झोलाछाप नही हैं लेकिन एलोपैथिक का प्रैक्टिस नही कर सकते। चुकी रजिस्टर्ड था तो वहां से वापिस आके नोटिस दिया गया सर्टिफिकेट जमा करना कहकर..उनको डर है और शायद उनकी सोच है कि इनपर मैं दबाव बनाऊंगा तो भविष्य में कोई भी अधिकारी जांच करने नही आएंगे..उनके द्वारा 10 दिन से दस्तावेज जमा नही किया गया।अगर वो सही हैं तो उनको दस्तावेज जमा करने में क्या दिक्कत है। उनके द्वारा बोला गया कि सब जमा कर दूंगा लेकिन नोटिस दिया गया तो नोटिस ले नही रहे हैं, जवाब नही दे रहे हैं। अपने को गम्भीर रूप से फंसता देख इल्ज़ाम लगाया जा रहा है।तीन लाख रुपये की बात उनके द्वारा बोली जा रही है उस बात में कोई सच्चाई नही है।

क्या कहते हैं के के पटेल-

अपने को बचते देख तोड़मरोड़कर पेश किया गया है। बीएमओ ने कार्यवाही की है। मेडिकल वाली बात को बीएमओ ही जानेंगे की फाइन होगा या एफआईआर होगा? मेरे पर लगाया गया आरोप निराधार है। कार्यवाही के डर से आरोप लगाया जा रहा है।

अब इसमें अधकारियों की गलती है या डॉक्टर वारे खुद को बचाना चाह रहे हैं ये तो जाँच के बाद ही साफ हो पायेगा। लेकिन दोनों पक्ष से सुनने के बाद कुछ बिंदु ऐसे निकलकर आ रहे हैं जो एक रहस्य बनकर लोगों के दिलो-दिमाग को झकझोरने हेतु काफी है-

1..क्या सचमुच डॉक्टर वारे से 3 लाख रुपये अधकारियों द्वारा ली गयी? या डॉक्टर बारे द्वारा जांच को दबाने की कोशिश की जा रही है?

2…क्या 3 लाख लेकर डॉक्टर वारे के समस्त गलतियों को दबाने की कोशिश की गयी थी .. भले ही 3 लाख के चक्कर मे कई मासूम पीड़ित की जान जोख़िम में डल जाये…!

3–जब डॉक्टर वारे के क्लिनिक में सब सही था तो वो किस डर की वजह से 3 लाख रुपये देने को मजबूर हुवे। जबकी वो एक पढ़े लिखे और इतने बड़े पद पर सुशोभित हैं।

4-क्या सच मे 23 वर्षीय बच्ची की मौत के जिम्मेदार हैं डॉक्टर वारे?

5..क्या क्लीनिक में आयुर्वेदिक डिग्री रखकर एलोपैथी ईलाज किया जाता है?

6..3 लाख की राशि देने के पश्चात 8-10 दिनों बाद इस मामले की खुलासा क्यों?

7. क्या ये हक की लड़ाई है या खुद को बचाने हेतु दबाव?

इन सारी बातों को लेकर लोग तरह तरह से कयास लगा रहे हैं।
फिलहाल जांच का जिम्मा एडिशनल एसपी गरिमा द्विवेदी के हाथों में और संवेदनशील एसडीएम नंदकुमार चौबे के पास है। उम्मीद है जल्द ही निष्पक्ष जांच कर दोषियों पे कार्यवाही की जावेगी।

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