छात्रों का बोझ होगा कम या बढ़ेगी टेंशन, जानें साल में दो बार परीक्षा से फायदा और नुकसान….

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केंद्र सरकार ने फैसला लिया है कि अगले शिक्षा सत्र से बोर्ड परीक्षाएं साल में दो बार होंगी. जिस एग्जाम का रिजल्ट बेहतर होगा, उसे मान्यता मिलेगी और उसी आधार पर अंतिम परिणाम घोषित किए जाएंगे.

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राज्यों को भी ऐसा करने के आदेश पहुंच चुके हैं. विद्वान शिक्षाविदों ने तय किया है तो निश्चित ही फैसला अच्छा हो होगा लेकिन इस राह में मुश्किलें कम नहीं होने वाली हैं. बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की राय यही है. वे मानते हैं कि शिक्षा के प्रति छात्रों की गंभीरता कम होगी.

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थोड़ा पीछे देखते हैं तो नवीं क्लास में एडमिशन के समय तय करना होता था कि स्टूडेंट क्या पढ़ाई करने वाला है? साइंस, कॉमर्स या आर्ट. समय आगे निकला तो यह व्यवस्था खत्म हो गयी. नवीं, 10 वीं सबके लिए एक कर दिया गया और 11 वीं में एडमिशन के समय पर तय होने लगा कि स्टूडेंट्स क्या पढ़ेगा? लेकिन बोर्ड एग्जाम 11 वीं और 12 वीं के कोर्स के आधार पर होता था.

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क्या होगा दो बार परीक्षा का असर?

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बदलाव से गुजरते हुए स्कूली शिक्षा अब साल में दो बोर्ड एग्जाम तक आ पहुंची है. शिक्षक इसे लेकर बहुत उत्साहित नहीं दिखाई दे रहे हैं. उनका मानना है कि इस व्यवस्था से नींव कमजोर हो जाएगी. बच्चों में परीक्षा का जो तनाव अभी साल में एक बार आता था, अब दो बार आएगा या ऐसा भी हो सकता है कि परीक्षा का भय बिल्कुल खत्म हो जाए.

शिक्षकों का कहना है कि गणित, फिजकस, केमिस्ट्री, बायो जैसे सब्जेक्ट ऐसे नहीं हैं कि छह महीने में उनकी बारीकी कोई भी बच्चा समझ सके. अब तो नई शिक्षा नीति में उसके पास विषय बदलने की आजादी है. 11 वीं में आर्ट के सब्जेक्ट पढ़ने वाला स्टूडेंट अगर 12 वीं में साइंस पढ़ने लगेगा तो उसकी समझ कितनी विकसित हो पाएगी, यह भी सवाल है.

CBSE Board में पहले से क्या नियम?

सीबीएसई आधारित केंद्रीय विद्यालय में तो शिक्षा के सत्र आमतौर पर नियमित होते रहे हैं. कोरोना काल में कुछ फेरबदल हुआ था लेकिन अब फिर ठीक हो गया है लेकिन राज्य बोर्ड और सीबीएसई आधारित अन्य निजी स्कूलों में एडमिशन फॉर्म भरे जाने तक किए जाने की परंपरा है. उत्तर प्रदेश बोर्ड के एक प्रिंसिपल कहते हैं कि वे अभी भी एडमिशन ले रहे हैं. जो स्टूडेंट आज आ रहा है, वह फरवरी में एग्जाम देगा. मतलब उसकी कुल पढ़ाई पांच महीने होगी. इस दौरान त्योहारों पर लंबी छुट्टियाँ हैं. उसी आधार पर वह एग्जाम देगा तो भला क्या ही कर पाएगा? यह अपने आप में बड़ा सवाल है. देखना रोचक होगा कि आगे हमारी शिक्षा प्रणाली क्या रूप-स्वरूप लेती है.

सीबीएसई स्कूल में शिक्षक पुरुषोत्तम मिश्र इसे सहज भाव से लेते हैं. उनका कहना है कि कोई बहुत नकारात्मक असर नहीं होने वाला है. कारण यह है कि साप्ताहिक टेस्ट, पाक्षिक टेस्ट, मासिक टेस्ट, तिमाही टेस्ट, छमाही टेस्ट अभी भी स्टूडेंट दे ही रहे हैं. वे नहीं मानते कि परीक्षा का कोई तनाव बच्चों पर पड़ने वाला है. जबकि केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक नीरज राय कहते हैं कि इसका नकारात्मक असर स्टूडेंट्स पर पड़ेगा. खतरा यह भी है कि स्टूडेंट्स बोर्ड परीक्षा की गंभीरता को ही शून्य मान सकते हैं. मतलब इस बात की आशंका बन रही है कि इसे गंभीरता से बिल्कुल न लें.

एग्जाम फोबिया बढ़ सकती है

केंद्रीय विद्यालय संगठन में उपायुक्त रहे डॉ जगदीश मोहन रावत कहते हैं कि बोर्ड परीक्षा देने वाले स्टूडेंटस की उम्र कम होती है. वे बहुत जल्दी से किसी भी चीज का तनाव ले लेते हैं. एग्जाम फोबिया से बड़े लोग पीड़ित दिखते हैं तो छोटे बच्चे तो छोटे ही हैं. डॉ रावत कहते हैं कि साल में दो बार बोर्ड परीक्षा कहीं ऐसा न हो कि बच्चों को मानसिक रूप से बीमार कर दे. नई शिक्षा नीति के सभी बदलाव अच्छे हैं लेकिन सरकार को चाहिए कि वह इस पर पुनर्विचार कर ले.

यूपी बोर्ड के इंटर कॉलेज में प्रिंसिपल अखिलेश कुमार रंजन कहते हैं कि इसमें मुश्किलें आने वाली हैं. बीते दस सालों में शिक्षा में जिस तरह के तेज प्रयोग हुए हैं, संभव है कि उसका फायदा किसी को मिल रहा हो लेकिन ज्ञान के लिए यह उचित नहीं माना जा सकता. स्टूडेंट्स को पढ़ने के लिए मौका चाहिए और टीचर को पढ़ाने के लिए भी. फिर दोहराव भी आवश्यक है. दो बार बोर्ड की परीक्षा में तो सबका तनाव बढ़ना है.

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