सारंगढ़: रोजी-रोटी की तलाश में परदेस गए छत्तीसगढ़ के मजदूरों के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गईं। सारंगढ़ जिले के दर्जनों मजदूरों को झारखंड के गुमला जिले में बंधक बनाकर उनसे अमानवीय परिस्थितियों में काम कराया जा रहा था। सामाजिक कार्यकर्ता की तत्परता और प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद आखिरकार 28 फरवरी की सुबह इन मजदूरों ने अपनों के बीच घर वापसी की।

जुल्म की दास्तां-
पिछले तीन महीनों से गुमला के AS ईंट भट्टा में काम कर रहे इन मजदूरों की स्थिति किसी गुलामी से कम नहीं थी। मजदूरों के मुताबिक, भट्टा मालिक सतीश कम प्रोडक्शन का हवाला देकर उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट करता था। हद तो तब हो गई जब महिलाओं के साथ छेड़खानी और अभद्र व्यवहार किया जाने लगा।
मूलभूत सुविधाओं का अभाव-
पूरे परिवार को हफ्तेभर के राशन के लिए महज 1000 रुपये दिए जाते थे।
इलाज पर पाबंदी- बीमार पड़ने पर कोई डॉक्टरी सहायता नहीं मिलती थी।
पुलिस की मिलीभगत?
मजदूरों ने जब स्थानीय घाघरा थाने में शिकायत की, तो पुलिस ने मदद के बजाय मालिक को सूचना दे दी, जिससे मजदूरों पर अत्याचार और बढ़ गया।
एक ईमेल से मिली आजादी-
खौफ के साये के बीच एक मजदूर किसी तरह भट्टा मालिक के चंगुल से भागकर छत्तीसगढ़ पहुँचा। उसने पलायन के मुद्दों पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता सुशील अनंत से संपर्क किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुशील अनंत ने तत्काल गुमला के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक (SP) को ईमेल भेजकर हस्तक्षेप की मांग की।
प्रशासनिक दबाव के बाद गुमला श्रम विभाग और राजस्व विभाग की टीम ने ईंट भट्टे पर छापा मारकर मजदूरों को मुक्त कराया। 17 फरवरी की शाम इन मजदूरों को बस के जरिए रवाना किया गया, जो 28 फरवरी की सुबह सकुशल सारंगढ़ पहुंचे।
“सरकारें विफल, पलायन का ग्राफ बढ़ रहा”-
मजदूरों की वापसी पर सामाजिक कार्यकर्ता ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा:
“छत्तीसगढ़ के 8 से 10 जिलों में पलायन का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। सरकारें इसे रोकने में पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। स्थानीय प्रशासन की उदासीनता के कारण मजदूर बिचौलियों के जाल में फंसकर बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर हैं।”
उन्होंने मांग की कि मजदूर वर्ग को सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिले और न्यूनतम मजदूरी व बंधुआ मजदूरी अधिनियम के प्रति व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाए।
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