रायपुर । डॉ. अंजना पीठालिया रायपुर की समाजसेविका और योगसाधिका हैं। मौन के बारे में उनके अनुभव प्रेरणादायक हैं। आज के डिजिटल युग में जहां ‘शोर’ हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है, उनका यह प्रयोग एक मानसिक औषधि की तरह है। मौन के संबंध में उनसे वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार धर द्विवेदी से चर्चा हुई। बातचीत का संपादित अंश प्रस्तुत है :

प्रश्न : आपने ‘मौन व्रत’ की शुरुआत कैसे की? क्या इसके पीछे कोई खास प्रेरणा थी?
उत्तर: मैंने मौन रहना किसी के दबाव या कहने पर शुरू नहीं किया, बल्कि यह मेरे अंतर्मन की प्रेरणा थी। मेरा उद्देश्य बहुत स्पष्ट था—खुद को फोन की व्यस्तता से दूर करना, मन को शांत करना और अपने भीतर की आवाज से जुड़ना।
प्रश्न: एक घंटे से शुरू होकर 24 घंटे के मौन तक का यह सफर कैसा रहा?
उत्तर: शुरुआत छोटे कदमों से हुई। पहले सिर्फ 1 घंटा, फिर धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर 3, 6 और 12 घंटे किया। आज मुझे 24 घंटे का पूर्ण मौन व्रत रखते हुए 4 साल हो चुके हैं। यह अभ्यास और धैर्य का परिणाम है।
प्रश्न : आज के समय में फोन के बिना रहना असंभव सा लगता है। आपने इस चुनौती को कैसे पार किया?
उत्तर: यह सच है कि लोग आधा घंटा भी फोन से दूर नहीं रह पाते। फोन न दिखने पर बेचैनी होने लगती है। लेकिन मैंने अभ्यास से इसे पूरी तरह छोड़ना सीखा। अपने अनुभव से कह सकती हूँ कि फोन के बिना कोई काम नहीं रुकता। बल्कि, जब फोन बंद होता है, तभी मन में गहरा सुकून और स्थिरता आती है।
प्रश्न : 24 घंटे के मौन के दौरान आप अपनी ऊर्जा का उपयोग कैसे करती हैं?
प्रश्न: जब मैं मौन रहती हूं तो फोन पूरी तरह बंद होता है। उस समय मैं भगवान का नाम जप करती हूं और अपने मन की बातें सुनती हूं। मौन का अर्थ केवल बोलना बंद करना नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर की शांति और धैर्य को जगाने का समय है।
प्रश्न : इस लंबी साधना से आपके व्यक्तित्व और स्वास्थ्य में क्या बदलाव आए?
उत्तर: मौन ने मुझे अनगिनत लाभ दिए हैं, जिन्हें शब्दों में बांधना कठिन है। क्रोध में भारी कमी आई और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ी। लोगों के प्रति करुणा और अपनेपन का भाव जागा। नींद की गुणवत्ता में सुधार हुआ और ऊर्जा का स्तर बढ़ा। भीतर एक अद्भुत संतुलन और आत्मविश्वास महसूस होता है।
प्रश्न : व्यस्त जीवन जीने वाले आम लोगों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: मैं सभी से निवेदन करती हूं कि दिन भर में कम से कम 1 घंटा मौन रहने की कोशिश करें। आज हम शोर और भागदौड़ में इतने उलझे हैं कि खुद से मिलना ही भूल गए हैं। याद रखें, शांति बाहर नहीं, हमारे भीतर ही है। मौन हमें कमजोर नहीं, बल्कि मानसिक रूप से बहुत मजबूत बनाता है। जब शब्द थमते हैं, तभी आत्मा बोलती है।
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