पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’: ब्रह्मांडीय चेतना का दिव्य नाद और कल्याण का मार्ग -डॉ. गौतमसिंह पटेल
सारंगढ़। भारतीय दर्शन की गहन परंपरा में मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि वह दिव्य ध्वनि है जो ब्रह्मांड की मूल चेतना को स्पर्श करती है। इनमें सर्वोपरि है पंचाक्षर मंत्र ‘नमः शिवाय’। श्री शिव महापुराण की विद्येश्वर और वायवीय संहिता के अनुसार, यह मंत्र स्वयं भगवान शिव के स्वरूप का साक्षात् अवतरण है जो सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और परम कल्याणकारी है।
प्रणव ‘ॐ’ से उत्पत्ति और पंचतत्वों का मेल-
इस दिव्य मंत्र की उत्पत्ति एकाक्षरी प्रणव ‘ॐ’ से हुई है, जो शिव के पंचमुखों से प्रकट हुआ। उत्तरवर्ती मुख से ‘अ’, पश्चिम से ‘उ’, दक्षिण से ‘म’, पूर्व से ‘बिंदु’ और मध्य से ‘नाद’ के मिलन से ॐ बना, जो शिव-शक्ति के अद्वैत का प्रतीक है। इसी से ‘नमः शिवाय’ का प्राकट्य हुआ, जो समस्त वेदों और विद्याओं का बीज है।
दार्शनिक दृष्टि: पंच ब्रह्म का सूक्ष्म रूप-
पंचाक्षर मंत्र के प्रत्येक अक्षर में सृष्टि के संचालन की शक्ति निहित है:
न (सद्योजात): सृष्टि का प्रतीक।
म (वामदेव): पालन की शक्ति।
शि (अघोर): संहार का कारक।
वा (तत्पुरुष): तिरोभाव (माया)।
य (ईशान): अनुग्रह (कृपा)।
’नमः’ शब्द अहंकार के पूर्ण समर्पण का सूचक है—अर्थात् “मेरा कुछ नहीं, सब शिव का है”, जबकि ‘शिवाय’ कल्याण के उस परम स्रोत की ओर इंगित करता है जहाँ साधक ‘शिवोऽहम्’ का साक्षात्कार करता है।
आधुनिक युग में प्रासंगिकता और मानसिक शांति-
आज के अशांत युग में ‘नमः शिवाय’ का जप एक आंतरिक क्रांति का सूत्र है। साहित्यिक सौंदर्य की दृष्टि से यह मंत्र एक अमर काव्य है, जिसका निरंतर स्मरण हृदय में शांति का अमृत बरसाता है और मानसिक विकारों को भस्म कर देता है। शिव पुराण के अनुसार, यह मंत्र समस्त मनोरथों की सिद्धि करने वाला और श्रुतियों का शिरोमणि है।
द्वैत से अद्वैत की यात्रा-
निष्कर्षतः, पंचाक्षर मंत्र शिव का स्वयंभू स्वरूप है। इसका अभ्यास साधक को उस परम शांति तक ले जाता है जहाँ ‘मैं’ और ‘तू’ का भ्रम मिट जाता है और केवल ‘शिव’ शेष रह जाते हैं। यह ध्वनि ही शिव का साक्षात् आह्वान है, जो प्रत्येक हृदय के लिए सुलभ और अनंत है।
लेखक:
डॉ. गौतमसिंह पटेल
सालर, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़)
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