“सारंगढ़ पुलिस की भूमिका को एकतरफा रूप से कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं”कानून के दायरे में सारंगढ़ पुलिस की कार्रवाई..जाम हटाते समय हुए विवाद में जांच जरूरी…
सारंगढ़।
कोरबा में पदस्थ तहसीलदार बंदे राम भगत द्वारा न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठने का मामला भले ही सुर्खियों में हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका को एकतरफा रूप से कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं माना जा रहा है। कानून के जानकारों और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने से पहले तथ्यों की जांच करना प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है, न कि लापरवाही।
प्राप्त जानकारी के अनुसार घटना भारत माता चौक पर उस समय हुई, जब कलेक्टर टीएल बैठक के लिए जा रहे थे और सड़क पर दो मोटरसाइकिलों की भिड़ंत से जाम की स्थिति निर्मित हो गई थी। जाम हटाने के लिए कलेक्टर का गनमैन मौके पर उतरा और यातायात सामान्य करने का प्रयास किया। इसी दौरान राहुल भगत से वाहन साइड में लगाने को कहा गया, जिस पर उन्होंने पहले वाहन हटाया, लेकिन बाद में वापस लौटकर वर्दीधारी गार्ड से विवाद कर लिया। देखते ही देखते कहासुनी ने मारपीट का रूप ले लिया।
सूत्रों का कहना है कि यह घटना ड्यूटी के दौरान उत्पन्न हुई अव्यवस्था से जुड़ी है, जिसमें दोनों पक्षों की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। ऐसे मामलों में मौके के प्रत्यक्षदर्शी, सीसीटीवी फुटेज, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही एफआईआर दर्ज की जाती है। दबाव या पद के प्रभाव में तत्काल एफआईआर दर्ज करना न केवल गलत नजीर पेश करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है।
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब तहसीलदार बंदे राम भगत थाना परिसर में भूख हड़ताल पर बैठ गए। प्रशासनिक हलकों में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि जिस थाना परिसर में 24 घंटे धारा 144 लागू रहती है, वहां इस प्रकार का धरना क्या नियमसम्मत था? पुलिस का तर्क है कि कानून सभी के लिए समान है—चाहे वह आम नागरिक हो या पदस्थ अधिकारी।
कुल मिलाकर, पुलिस का रुख यही है कि वह किसी भी पक्ष के दबाव में आए बिना, तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही कार्रवाई करेगी।
कानून व्यवस्था बनाए रखना और निष्पक्ष जांच करना पुलिस का कर्तव्य है, और इस प्रकरण में जल्दबाजी के बजाय विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाना ही न्यायसंगत माना जा रहा है।
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