अपने ही विभाग में अफसरों से क्यों डरे-सहमे रहते है पुलिस कर्मी…? सुरक्षा और सेवा के बीच विभागीय प्रताड़नाओं की घटना से स्वस्थ जवानों की बिगड़ने लगी मनोदशा….
नितिन सिन्हारायपुर/कोरबा – आज तक आपने पुलिस की नौकरी में पैसा और पावर जैसी तमाम बातें सुनी होंगी,परन्तु इस जबरन के चकाचौन्ध भरी जिंदगी के पीछे पुलिस जवानों के दर्द की जानकारी हम-आप में से बहुत कम लोगों को ही होगी। खाखी के रुबाब के पीछे का स्याह सच बेहद दुःखद है। पुलिस की नौकरी में जितना छोटा पद होता है उतनी ज्यादा परेशानियां और तकलीफें उठानी पड़ती है। आम तौर पर पुलिस का जवान एक नौकरी में दोहरी सेवा करता है,एक तरफ तो वह सरकारी जिम्मेदारियों का पालन करता है तो दूसरी तरफ वह विभागीय अफसरों की जी हुजूरी भी करता है।। इस वजह से उसका अपना परिवारिक और सामाजिक जीवन बुरी तरह से प्रभावित हो जाता है। लम्बे समय तक एक जैसे माहौल में चुपचाप रहकर बेहद तनाव भरी कार्यशैली के कारण पुलिस जवान धीरे-धीरे टूटने लगते है। यही वजह है कि हर दो से तीन दिन के अंतराल में देश में कही न कही कोई न कोई एक पुलिस जवान आत्महत्या कर लेता है। विभाग में एक और बड़ी विडम्बना यह भी है कि जिस तरह देश भर के तमाम सरकारी विभाग के कर्मचारियों को अपनी मांगों को मनवाने के लिए धरना-प्रदर्शन,आंदोलन या रैली करने का लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त है,यह अधिकार पुलिस विभाग के कर्मचारियों को नही है। यहां तक कि पुलिस विभाग में साप्ताहिक अवकाश,निश्चित सेवा घण्टों की सुविधा भी नही है।
जबकि अन्य विभागों से ज्यादा चुनौती और जिम्मेदारी का काम पुलिस के कंधों पर है,इस वजह से बाकी विभागों की तुलना में पुलिस विभाग में अथक सेवा और शोषण की लंबी दास्तां भी है।विभागीय प्रताड़ना और मानवाधिकार पुलिस विभाग में बड़ी समस्या-पुलिस विभाग में सेवाकाल का निर्धारण न होना एवं साप्ताहिक अवकाश की अनुपलब्धता के अलावा लगातार घर-परिवार से दूर रहना और दूरस्थ थानों में पोस्टिंग पुलिस विभाग की अधोसंरचना में पहले क्रम की बड़ी खामियाँ है। इसके साथ ही वेतन में असमानता,पदोन्नति के अवसरों की कमी,भेदभाव पूर्ण व्यवहार,अनुशासन के नाम पर अधिकारियों की निरंकुशता,विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला और गैरजरूरी राजनीतिक हस्तक्षेप दूसरे क्रम की महत्वपूर्ण समश्याएँ है। इन सबके बीच नियमित सेवा देने वाला एक पुलिस कर्मी/जवान पूरी तरह से टूट जाता है। अपनी पारिवारिक जरूरतों की वजह से वह चाह कर भी खुद को नौकरी(सेवा) से अलग नही कर पाता है। ऐसे में बहुत से पुलिसकर्मी आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाने से भी नही चूकते हैं। ऊपर से विभाग के कुछ दागी अफसरों के द्वारा मातहत कर्मचारियों से किया जाने वाला दुर्व्यवहार,उनका शारीरिक और मानसिक शोषण करना भी विभाग के लिए नई बात नही है।जबकि आम पुलिस कर्मी ऐसे माहौल में इतना डरा सहमा रहता है कि वह अपने साथ होने वाली ज्यादतियों की शिकायत भी विभाग के उच्चाधिकारियों या जन प्रतिनिधियों से नही कर पाता है। उसे अपने ऊपर चाबुक से भी तेज चलने वाले विभागीय अनुशासन के डंडे का इतना भय होता है कि वह चुपचाप सब कुछ सहन करना या घुट-घुट कर जीना सीख जाता है,और जो इस त्रुटि पूर्ण विभागीय सिस्टम के साथ अपना तालमेल नही बिठा पाता है, वह जवान या पुलिस कर्मी खुद अपने हाथों से अपनी जान लेने जैसा कृत्य भी कर बैठता है।।राज्य में पुलिस सुधार का प्रयास कर रहे स्वयंसेवी पूर्व आरक्षक राकेश यादव ने हालिया घटित एक घटना क्रम को सोशल मीडिया में शेयर किया है। जिसे जानना और समझना बेहद जरूरी है।*मैं राकेश यादव पिता स्वर्गीय श्री बी आर यादव तालापारा बिलासपुर का निवासी हूं।*मैं यह कथन करता हूं कि मेरे पास कोरबा से पुलिस जवान भाई का फोन आया और उन्होंने कहा कि मैं अपने ही पुलिस विभाग के द्वारा बहुत ज्यादा प्रताड़ित हूं। तब हमने अपनी जिम्मेदारी मानते हुए राज्य के डी जी पी साहब को उस प्रकरण की शिकायत की. तत्पश्चात सी एस पी ऑफिस दर्री कोरबा से मोबाइल नंबर+91 9770111246 के द्वारा मेरे पास एक फोन आया और कहा गया कि आप यहां उपस्थित होकर अपना कथन दर्ज कराएं। तब मैंने निवेदन किया कि मुझे पहले पीड़ित जवान भाई से बात करने दीजिए ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि वह अपना परिचय व्यक्त करना चाहते हैं या नहीं।। बात करने पर पीड़ित जवान भाई ने अपना परिचय व्यक्त करने से साफ मना कर दिया. क्योंकि वह बहुत ज्यादा डरा-सहमा हुआ था । *उन्होंने बताया कि मैं पुलिस विभाग द्वारा बहुत ज्यादा प्रताड़ित हूं मेरी फरियाद ना ही एस पी कोरबा और ना ही बिलासपुर रेंज के आई जी साहब ने सुनी.* इस कथन के साथ हमारा अनुरोध है कि किसी जवान को इतना भी ना सताया जाए कि वह नामजद अपनी शिकायत भी दर्ज ना करा सके। पुलिस विभाग की बेहतरी के लिए सभी को न्याय मिले हर जवान का सम्मान हो.इधर जब तक मैं इस पोस्ट के आधार पर पुलिस विभाग में पुलिस जवानों/आरक्षकों से जुड़ी कुछ समश्याएँ लिख पाता तब तक एक और दुःखद खबर सामने आई। जिसमें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पूर्व मंत्री और भाजपा के विधायक बृजमोहन अग्रवाल की सुरक्षा में तैनात उनके पीएसओ ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली है।मृतक जवान 35 साल का विशंभर राठौर है। ये जवान पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की सुरक्षा में तैनात था। गुरुवार सुबह करीब 5 बजे उसने सर्विस पिस्टल से खुद को गोली मार ली। सुबह 11 बजे जब उसके सहकर्मी कमरे में पहुंचे तो घटना की जानकारी हुई। पारिवारिक विवाद की वजह से पत्नी दूसरी जगह पर रह रही थी। जांच में ये बात सामने आई है कि पत्नी से अनबन की वजह से मानसिक तौर पर विशंभर परेशान रहा करता था। अनुमानतः रायपुर में आत्महत्या की उक्त घटना को जोड़कर देखे तो पाएंगे कि अकेले वर्ष 2021 में अब तक छ ग पुलिस के करीब एक दर्जन जवानों ने विभिन्न कारणों से आत्महत्याएँ की है। इनमें महिला पुलिस कर्मी भी शामिल है। जबकि केंद्रीय पुलिस बल और होमगार्ड्स में घटी घटनाओं को जोड़े तो यह आंकड़ा लगभग दोगुना हो जाता है। वही पूरे देश की बात करें यह आंकड़ा 100 के आसपास आकर टिकता है। जो इतना बताने के लिहाज से काफी है कि पुलिस विभाग में अविलंब पुलिस सुधार का लागू किया जाना कितना जरूरी है। परन्तु विडम्बना यह है कि इस विषय को लेकर देश/ प्रदेश की राजनीतिक पार्टियों के अलावा खुद पुलिस विभाग भी गम्भीर नही है।
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