ब्रम्हलीन हुवे श्रद्धेय स्वामी सत्यरूपानंद…आप कहीं नहीं गए हैं आप हमारे प्राणायाम में ही हैं-बिभाष कुमार झा

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अजीत यादव

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रायपुर । आज का दिन जीवन में एक बड़ा शून्य दे गया, जब हमारे पूज्य और प्यारे नानाजी श्री संतोष झा (जिनका संन्यास उपरान्त परिचय स्वामी सत्यरूपानंद जी के रूप में प्रचलित रहा) ब्रह्मलीन हो गए. नानाजी (अम्मा के मामाजी) का सान्निध्य मुझे बचपन से ही अब तक निरंतर मिलता रहा. अपने स्कूल के दिनों में, रामकृष्ण आश्रम स्थित उनके ही कक्ष में सामने बैठकर सभी तरह के प्राणायाम सीखने को मिले, जो आज तक एक दिन का नागा किये बिना भी बदस्तूर जारी है. उन्होंने ही तब के समय में सिविल लाइन स्थित सत्यदर्शन योग-आश्रम में स्वामी अशेषानन्द सरस्वतीजी से आसन और बन्ध भी सीखने को भेजा. वर्षों तक विवेकानंद आश्रम के पुस्तकालय में जाने के बहाने उनसे सुबह और शाम की भेंट होना और स्वामी विदेह-आत्मानंद जी के साथ घंटों चर्चा करने का अवसर मिलना, विवेकज्योति पत्रिका की पुरानी प्रतियाँ मिलना, परमपूज्य पंडित रामकिंकरजी महाराज, और राजेश रामायणीजी के वार्षिक प्रवचन के दिनों में नानाजी द्वारा आग्रह और आदेश की तरह से बुलाकर इन दोनों महानुभावों से चर्चा करने का परम सौभाग्य मिलना. ऐसी कितनी ही बातें हैं, जो आज एक ही झलक में फ्लैशबैक की तरह घूम रही हैं. हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में काम करते हुए विभिन्न अवसरों पर नानाजी के कारण ही अनेक विभूतियों से साक्षात्कार करने का सुअवसर भी मिला, जिनके विषय में समाचार अथवा अन्य सामग्री प्रकाशित करके मुझे भी कुछ सार्थक करने का सुख मिलता रहा, वरना खबरें तो अक्सर लिखे जाने के कुछ घंटे बाद ही अनुपयोगी हो जाया करती हैं. कुछ और बड़े हुए तो वर्ष 2002 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद राज्योत्सव में मुझे चंदूलाल चंद्राकर फेलोशिप मिलने के समय समारोह में नानाजी और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त श्री हबीब तनवीर साहब के साथ एक ही पंक्ति में मंच पर बैठने का परम सौभाग्य मिला, जबकि मैं उस समय पत्रकारिता सीख ही रहा था. मंच के सामने पहली पंक्ति में अम्मा और पापाजी सहित परिवार के अन्य सदस्य भी थे. नानाजी के लिए अम्मा और अम्मा के लिए नानाजी हमेशा एकदम जरूरी रहे. क्योंकि मेरी अम्मा के पिताजी (यानी हमारे अपने नानाश्री को वन विभाग में बड़े पद पर रहने के कारण अक्सर ही स्थान बदलते रहना पड़ता था. ऐसे में जगदलपुर के राजगुरु बाड़े में संतोष नानाजी ही बचपन से स्कूल की पढ़ाई पूरी होने तक, अम्मा को तैयार करना, उनकी चोटी करना और फिर अपनी साईकिल से स्कूल पहुंचाना- जैसे सारे काम खुद किया करते थे. अम्मा से हम सभी भाई-बहन, संतोष नानाजी के कितने ही किस्से सुन-सुन कर बड़े हुए. फिर बाद में जब हमारे अपने नानाश्री और नानीजी रायपुर आते तो मेरा ही काम होता था, उन्हें लेकर रामकृष्ण आश्रम जाना और संतोष नानाजी से मिलवाना. पहली बार जब मै अपने नानाश्री (महादेव ठाकुरजी- जो स्वयं गायत्री के उपासक रहे और महीनों-महीनों मौन व्रत रखने वाले साधक रहे) को वर्ष 1992 में अक्टूबर महीने के किसी दिन (तारीख याद नहीं आ रही) लेकर आश्रम गया, तो प्रथम तल पर नानाजी के कमरे में प्रवेश करते ही बरसों बाद दोनों का मिलन आज भी मेरी आँखों में अश्रु की धारा ले आता है. नानाश्री उम्र में बहुत बड़े होने के बावजूद, (रिश्ते में अपने साले साहब कहलाने वाले) संतोष नानाजी को देखते ही उनके चरणों में दण्डवत होकर लेट गए और अपना सिर उन्होंने संतोष नानाजी के चरणों में रख दिया. फिर संतोष नानाजी ने उन्हें उठाकर कहा- “जीजाजी आप यह क्या अनर्थ कर रहे हैं.” प्रति उत्तर में नानाश्री ने कहा- “संतोष अब तुम मुझसे बहुत बड़े हो गए हो. जगदलपुर छोड़ने के बाद दंतेवाडा में रहते हुए और बरसों तुमसे दूर रहने के बाद, आज तुम्हे इस दिव्य रूप में देखकर मैं अपने को तुम्हारे चरणों में ही रखते हुए धन्य महसूस कर रहा हूँ. मुझे मत रोको.” यह आरंभिक संवाद और फिर उसके बाद घर-परिवार के तमाम पिछले पन्ने खुलने का सिलसिला करीब डेढ़ से दो घंटे तक चलता रहा. बाद में अपनी नानी (आदरणीय सावित्री ठाकुर) को भी मैंने उनके छोटे भाई (संतोष नानाजी) से बरसों बाद मिलवाने का दुर्लभ सुख पाया. तब नानी भी उनसे मिलकर बहुत देर तक रोती रही. फिर तो सभी मौसियों को भी बारी-बारी से मिलवाना होता रहा. इन सबके कारण नानाजी के मन में मेरे लिए एक विशेष अनुराग हमेशा बना रहा.

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जब मोबाइल फोन का जमाना नहीं था तब उनसे मिलने के लिए शुरू-शुरू में लैंडलाइन पर आश्रम के कार्यालय में ही पूछना पड़ता था कि क्या बड़े महाराज (आश्रम में सभी उन्हें इसी तरह संबोधित करते थे) यहाँ हैं? जवाब – “हाँ”- में मिलने पर हम वहां चले जाया करते थे. बाद में नानाजी ने सभी से परिचय करवा दिया था तो – “नानाजी शहर में हैं क्या” – पूछने पर ही वहां के सभी लोग उचित उत्तर दे दिया करते थे. वे चूँकि देश भर में प्रवास पर भी रहा करते थे. इसलिए अपने मिलने के विषय में नानाजी ने एक उपाय मुझे सिखाया था. वे कहते थे- “तुम घर से पूरे विश्वास के साथ यह कहकर निकलो कि – मेरी भेंट आज नानाजी से जरुर हो रही है. और मैं तुम्हे यहाँ मिल जाऊँगा.” मैंने इस उपाय को बार-बार तो नहीं परखा था. लेकिन जब दिसंबर 2015 में मेरी जुड़वां बेटियों (अमानी और अयानी) का हमें अन्न-प्राशन्न करना था, तो उस दिन मैंने उनके मोबाइल पर फोन लगाया. पर उनसे बात नहीं हो सकी. सात से आठ बार लगाने के बाद मैं हताश हो गया. चूँकि उस समय तक मेरे माता-पिता दोनों ही देव-लोक वासी हो चुके थे, इसलिए मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मेरी बेटियों का अन्न-प्राशन्न नानाजी के शुभ आशीर्वाद के साथ उनके ही हाथों से हो. आखिरकार मैंने घर के सभी सदस्यों से कहा कि -चलो आश्रम चलते हैं, नानाजी जरुर मिलेंगे.” और वहां पहुंचकर देखा तो नानाजी बहुत बड़े आयोजन में सामने ही मंच पर बैठे हुए थे. संभवतः इसीलिए उन्होंने अपना मोबाइल फोन नहीं देखा होगा. और उस दिन नानाजी के बताये हुए उपाय का परीक्षण भी हो गया, जो सफल रहा. हर मुलाकात के दौरान विभिन्न विषयों पर लिखी गई किताबों को लेकर भी उनसे कितनी ही बातें हुआ करती थीं. लेकिन वर्ष 1994 में विवेकानंद जयंती के बाद के दिनों में भेंट के दौरान नानाजी ने जर्मन मनोविज्ञानी एरिक फ्रॉम की लिखी हुई किताब — “टू हैव ऑर टू बी“- की चर्चा की थी. वह तो किसी तरह से भूली नहीं जा सकती. नानाजी ने इसके बाद लगातार होने वाली छः से सात मुलाकातों के दौरान मुझे बहुत विस्तार से इस किताब के बारे में समझाया था. किताब से जुडी, उनकी बताई हुई बातों को मैंने कई तरह से आत्मसात किया, जो बहुत लाभकारी रहा. ऐसी ही और भी कुछ चुनिन्दा किताबों को वे मुझे पढने को कहा करते थे. इनमें एक और किताब का जिक्र करना जरुरी जान पड़ता है- वह है स्वामी अभेदानंदजी की किताब – “मृत्यु के पार”. उनकी बताई हुई बाकी किताबों पर फिर कभी विस्तार से लिखना हो सके शायद.

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उनके महान और अनुपम व्यक्तित्व के ऐसे और भी अनेक पहलू थे, जिनकी झलक पाने के बाद मुझे यह भीतर से महसूस होने लगा कि वास्तव में वे विराट व्यक्तित्व के स्वामी थे. और मै उनके रोम-रोम से प्रभावित रहता था. अकेले उनके पास बैठना और उनके शयन कक्ष में घंटों उनसे बातें करना एक अनिर्वचनीय अनुभव होता था. उन्हें दिव्यता के साथ देखकर कभी-कभी मुझे भी संन्यस्त जीवन जीने की उत्सुकता होती थी. पूछने पर वे यही कहते थे- “बड़े भाई पिंकी के असमय निधन के बाद तुम ही घर में बड़े बेटे हो. इसलिए गृहस्थ ही रहो. मुझे आशीर्वाद में जो तुम्हे देना होगा, मै तो दूंगा ही.” और वास्तव में नानाजी ने कितना कुछ दिया मुझे, जो मेरे जीवन भर के लिए अपरिमित है. वे आश्रम में आने वाले प्रायः सभी लोगों से मुझे यही कहकर मिलवाते थे -“ ये मिक्की (मेरा घर का नाम) मेरा प्रिय नाती है. पत्रकार है, और रेडियो में समाचार पढता है. जब कभी उनसे मिलने में लम्बा अंतराल हो जाता – तो फिर अगली बार आश्रम जाने पर तत्क्षण कहते- “ क्यों रे नाती, इस बार तुझे मिलने में बहुत दिन लग गए?”. आज उनकी मिश्री जैसी मीठी आवाज में, यही वाक्य मेरे कानों में लगातार गूंज रहा है. अब ये वाक्य मुझे आश्रम जाने पर दोबारा कभी सुनने को नहीं मिलेगा….

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…. लेकिन नानाजी मेरे लिए आप कहीं नहीं गए हैं. आप हमेशा मेरे भीतर रहते हैं, मेरी हर सुबह के प्राणायाम में, बन्ध में और आसन में. नानाजी आपको सादर नमन और चरण स्पर्श.

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