लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का संगम: देवसागर में चैत्र पूर्णिमा पर लगा भव्य हिंगलाज माता मेला, चमत्कारिक मान्यताओं ने बढ़ाई श्रद्धा…

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भटगांव। नगर भटगांव से महज 3 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम देवसागर में चैत्र पूर्णिमा के पावन अवसर पर आस्था का विराट जनसैलाब उमड़ पड़ा। मां हिंगलाज भवानी (जेवरादाई) के दरबार में हजारों नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे। इस मौके पर मंदिर परिसर में एक दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया गया, जहां सुबह 5 बजे से लेकर रात 8:30 बजे तक भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी रही।
श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिन सच्ची श्रद्धा से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है, यही वजह है कि दूर-दूर से लोग नारियल, नींबू चढ़ाकर माता से आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।

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हल्दी के छींटे की अनोखी परंपरा, मन्नतें होती हैं पूरी

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मंदिर में प्रसाद के रूप में दी जाने वाली हल्दी का विशेष महत्व है। पुजारी द्वारा माता को अर्पित हल्दी का छींटा श्रद्धालुओं को दिया जाता है, जिसे अत्यंत चमत्कारी माना जाता है।
एक अनोखी परंपरा के तहत कई श्रद्धालु “धरनीहीन” बनकर जमीन पर लेट-लेटकर (लोट मारते हुए) मंदिर तक पहुंचते हैं। वे पूरी रात मंदिर परिसर में लेटे रहते हैं और सुबह जमींदार परिवार द्वारा पूजा के बाद हल्दी पानी के छींटे से उठाए जाते हैं।
मान्यता है कि संतान सुख से वंचित या शारीरिक कष्ट झेल रहे लोगों की मनोकामनाएं यहां अवश्य पूरी होती हैं।

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पहाड़ों और वनांचल के बीच आध्यात्मिक अनुभव

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मां हिंगलाज मंदिर पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ है, जहां भैरवनाथ, बजरंगबली, राधा-कृष्ण, महादेव और नंदी सहित कई देवी-देवताओं के मंदिर भी बने हुए हैं।
शाम होते ही पहाड़ियों की सुंदरता और भी निखर उठती है, और श्रद्धालु दर्शन के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी भरपूर आनंद लेते हैं।

रहस्यमयी मान्यता: रात में नहीं रुकता कोई

इस मंदिर से जुड़ी एक रहस्यमयी मान्यता भी प्रचलित है। कहा जाता है कि रात 9 बजे के बाद कोई भी व्यक्ति मंदिर परिसर में नहीं रुकता, क्योंकि मान्यता है कि उस समय मां स्वयं क्षेत्र में भ्रमण करती हैं।
कुछ स्थानीय लोगों का यह भी दावा है कि देवी का वाहन शेर आकर बलि के बकरे का रक्त चाटकर उसे पूरी तरह साफ कर देता है।

जमींदार परिवार की पीढ़ियों से सेवा

मंदिर में पूजा-अर्चना का दायित्व पीढ़ियों से भटगांव जमींदार परिवार निभाता आ रहा है। अंतिम जमींदार प्रेम भुवन प्रताप सिंह के बाद उनकी वंशज प्रभादेवी और इंदिरा कुमारी ने वर्षों तक सेवा की। वर्तमान में उनके गोद पुत्र पुष्पेंद्र प्रताप सिंह द्वारा पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जा रही है।
मां हिंगलाज को इस परिवार की कुलदेवी के रूप में भी पूजा जाता है।

राजघराने से जुड़ी रोचक कथा

मंदिर का इतिहास सारंगढ़ राजघराने और भटगांव जमींदार से जुड़ी एक प्राचीन कथा से भी संबंध रखता है।
कहा जाता है कि सारंगढ़ के राजा मां को अपने राज्य ले जाना चाहते थे, लेकिन देवी की शर्त और भटगांव जमींदार के हस्तक्षेप के कारण मूर्ति देवसागर में ही स्थापित हो गई।
मान्यता यह भी है कि देवी की नाक (नथनी) का हिस्सा सारंगढ़ ले जाया गया, जहां आज भी चैत्र पूर्णिमा पर उसकी पूजा की जाती है।

आस्था, परंपरा और रहस्य का अद्भुत संगम

देवसागर का यह मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और रहस्य का अद्भुत संगम है।
हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा पर यहां उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि मां हिंगलाज के प्रति लोगों की श्रद्धा आज भी अटूट और अडिग है।

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