राशन के बदले ‘टैक्स’ का डर? कंड्रजा में ई-पॉस, उगाही और प्रशासनिक दावों के बीच घिरते सवाल..शिकायत अफवाह या सच्चाई?
धरमजयगढ़। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को लेकर कापू क्षेत्र के एक गांव से उठे विवाद ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मामला कापू तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत विजयनगर के कंड्रजा गांव का है, जहां सैकड़ों ग्रामीण—विशेषकर महिलाएं—बीते दिनों राशन वितरण में कथित गड़बड़ी की शिकायत लेकर तहसील कार्यालय और कापू थाना पहुंचीं।
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत के सरपंच-सचिव तथा विक्रेता पंच के माध्यम से राशन वितरण किया जाता है, जहां हितग्राहियों से ई-पॉस मशीन में अंगूठा लगवाने के बावजूद राशन नहीं दिया गया। आरोपों के अनुसार पंच द्वारा प्रति परिवार 300 रुपये की वसूली की जा रही थी और साफ शब्दों में कहा जा रहा था कि “जब तक 300 रुपये जमा नहीं होंगे, तब तक राशन नहीं मिलेगा।” इन आरोपों के समर्थन में ग्रामीणों ने वीडियो बयान भी प्रस्तुत किए, जिसके बाद मामला स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया में तेजी से फैल गया।
मामले की गंभीरता बढ़ते ही खाद्य विभाग और स्थानीय प्रशासन सक्रिय हुआ। खाद्य निरीक्षक ने गांव पहुंचकर जांच की। इसके बाद कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म पर अधिकारियों का बयान सामने आया कि खबर “भ्रामक” है और 300 रुपये की राशि राशन से नहीं बल्कि पंचायत द्वारा लिए जाने वाले मकान टैक्स से संबंधित है।
हालांकि यहीं से कई नए सवाल खड़े हो गए हैं। यदि यह राशि वास्तव में मकान टैक्स है, तो क्या टैक्स न देने पर राशन रोके जाने की चेतावनी देना वैधानिक है? बिना राशन दिए ई-पॉस मशीन में अंगूठा लगवाना किस नियम के अंतर्गत आता है? क्या खाद्य विभाग की किसी स्वीकृत प्रक्रिया में ऐसा प्रावधान है?
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने लिखित शिकायत दी, वीडियो बयान दिए और सैकड़ों लोगों के साथ थाना तक पहुंचे—ऐसे में यदि खबर को भ्रामक बताया जा रहा है तो क्या उनकी शिकायत को अफवाह माना जाएगा? यह सवाल भी उठ रहा है कि पंचायत द्वारा 300 रुपये का मकान टैक्स क्या निर्धारित सरकारी दर है या फिर मनमानी वसूली? कई हितग्राहियों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें जो रसीद दी गई, उसमें सरपंच-सचिव की सील और हस्ताक्षर स्पष्ट नहीं हैं, जिससे पारदर्शिता पर संदेह और गहरा गया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में राशन दुकानों से जुड़ी शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं, लेकिन इस मामले ने एक बार फिर व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर बहस तेज कर दी है। दूसरी ओर, विवाद बढ़ने के बाद कई हितग्राही अब शिकायत दर्ज कराने से कतराते दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि शिकायत करने पर दबाव या परेशानी का डर बना रहता है।
इन तमाम परिस्थितियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या राशन आम नागरिक का अधिकार है या फिर टैक्स, अंगूठा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच उलझी एक मजबूरी? मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं। आगे अपडेट के लिए बने रहें।



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