बिल्ववृक्ष साक्षात् शिव का स्वरूप, इसके मूल में बसते हैं समस्त तीर्थ: डॉ. गौतमसिंह पटेल
सारंगढ़/सालर। सनातन धर्म में प्रकृति और परमात्मा के अटूट संबंध को स्पष्ट करते हुए प्रसिद्ध विद्वान डॉ. गौतमसिंह पटेल ने श्रीशिवमहापुराण के आधार पर बिल्ववृक्ष (बेल) की महिमा पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि विद्येश्वरसंहिता के 22वें अध्याय के अनुसार, बिल्ववृक्ष स्वयं भगवान महादेव का रूप है और इसकी स्तुति स्वयं देवताओं द्वारा की जाती है।
जड़ में है गंगा-यमुना का वास-
डॉ. पटेल ने बताया कि संसार के सभी प्रसिद्ध तीर्थ जैसे गंगा, यमुना और प्रयाग आदि बिल्ववृक्ष के मूल (जड़) में ही निवास करते हैं। जो भक्त श्रद्धापूर्वक बिल्व के मूल में लिंग रूपी अविनाशी भगवान शिव की पूजा करता है, उसे निश्चित ही शिवलोक की प्राप्ति होती है। इसके मूल में जलाभिषेक करने वाला व्यक्ति पृथ्वी पर पूर्णतः पवित्र हो जाता है और उसे समस्त तीर्थों में स्नान का फल प्राप्त होता है।
दरिद्रता का नाश और संतान वृद्धि-
शास्त्रों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति गंध, पुष्प और चंदन से बिल्व के मूल का पूजन करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और संतान की वृद्धि होती है। विशेष रूप से, बिल्ववृक्ष के नीचे दीपमाला का दान करने से मनुष्य तत्वज्ञान से संपन्न होकर महादेव के सान्निध्य को प्राप्त करता है।
एक शिवभक्त को भोजन कराने का फल करोड़ों के बराबर
आलेख में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक बिल्ववृक्ष के नीचे किसी शिवभक्त को भोजन कराता है, उसे करोड़ों मनुष्यों को भोजन कराने जैसा पुण्य मिलता है। विशेषकर दूध और घी युक्त अन्न का दान करने वाला भक्त कभी दरिद्र नहीं रहता।
मोक्ष का मार्ग है बिल्व आराधना-
डॉ. पटेल के अनुसार, बिल्व के नवीन कोमल पत्तों (नव पल्लव) से पूजा करने पर समस्त पापों का नाश हो जाता है। उन्होंने भक्तों का आह्वान किया है कि ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हुए बिल्व मूल की आराधना करें, क्योंकि सच्ची भक्ति सरल विधियों से ही सिद्ध होती है और अंततः मोक्ष प्रदान करती है।
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