दीपावली को अब कम समय बचा है। संपूर्ण भारतवर्ष में इस त्यौहार को धूमधाम से मनाया जायेगा। क्या अपने सोचा है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में रहने वाले आदिवासी दीपवाली कैसे मनाते होंगे?

इसका जवाब हम आपको आज दे रहे हैं। आपको जानकार अचरज होगा कि बस्तर के आदिवासी संस्कृति में दीपावली पर्व शामिल ही नहीं है।

महालक्ष्मी नहीं, ग्राम देवता की होती हैं पूजा
यही वजह है कि जब पूरा देश मां महालक्ष्मी का पूजन करके दीपावली मना रहा होता है। घरों को दीपो से रोशन कर रहा होता है,तब बस्तर में गोंड आदिवासी अपनी अनोखे परंपराओं को समेटे दियारी मना रहे होते हैं। बस्तर के आदिवासी दीपावली नहीं, लेकिन दियारी तिहार अवश्य मनाते हैं। इसमें मां लक्ष्मी की नहीं, बल्कि ग्राम देवता की पूजा की जाती हैंं। यदि आप ग्रामीण भारत को समझते हैं, तो ग्राम देवता से आवश्यक परिचित होंगे, जिसका अर्थ होता है हर गांव का अपना देवता,जिसके आशीर्वाद के बिना कोई भी शुभकार्य या पूजा शुरू नहीं होती।
1 महीने तक मनाया जाता है ‘दियारी पर्व, 3 दिन होते हैं विशेष
बस्तर में गोंड आदिवासी हल्बी भाषा बोलते हैं। इसी भाषा में लोकपर्व को दियारी नाम दिया गया है, गोंडी बोली में उसे दीवाड़ भी कहते हैं। इस पर्व में दीप प्रज्ज्वलन, लक्ष्मी पूजन, पटाखे चलाने जैसी कोई परम्परा नहीं है। माना तो यह भी जाता है कि घने जंगलो के बीच बेस अबूझमाड़ के सुदूर अंचल के गांवों में आदिवासी तो दीपावली से परिचित भी नहीं हैं। हालाकिं वह 3 दिनों तक दियारी तिहार जरूर मनाते हैं। इस दौरान कोठार में बांस के सूपे में धान रखकर उसका पूजन भी किया जाता है। पुरुष धान की बालियों से सेला बनाकर मवेशियों को नहलाकर कर खिचड़ी खिलते हैं। पूजा की परंपरा एक माह तक चलती है।
‘दियारी’ के बाद आता है ‘पंडुम त्योहार’
बस्तर संभाग के आदिवासी समुदाय जैसे मुरिया, हल्बा, दोरला, माड़िया, भतरा आदि दियारी तिहार मनाते हैं। इसमें ग्राम देवता को पकी फसल का चावल, कुम्हड़ा (कद्दू), सेमी का फल चढ़ाया जाता है। इसी दौरान देवता के निकट ग्रामीण दीप जलाते हैं। इसके बाद दिसंबर के अंत और जनवरी के प्रथम सप्ताह के आसपास गाड़ी पंडुम त्योहार मनाया जाता है। तब किसान फसलों की कटाई करते हैं। इसमें अपनी श्रद्धा मुताबिक फसल का कुछ हिस्सा देवता को अर्पित करते हैं। इस परंपरा को पट्टी देना कहा जाता है।
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