रायगढ़: जब सटोरिए और अवैध कबाड़ी लोगों से कहते फिरे कि थाने से संबंधित कोई काम होगा तो बताना, तो समझिए शहर का अमन चैन खतरे में है – आलोक सिंह

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क्या शहर में कानून का राज खत्म हो गया है ? आखिर शहर के युवा आत्महत्या क्यों कर रहे हैं ? सट्टा और जुए की लत को बढ़ावा देने वाले सटोरियों का बाल भी बांका आखिर क्यों नहीं हो रहा है। दिखावे की कार्रवाई और अखबारों में इश्तहार नुमा समाचार प्रकाशन को ही अपना कर्तव्य समझ लेने वाली पुलिस की अकर्मण्यता के इतने भयावह नतीजे सामने आ रहे हैं फिर भी सब मौन है। आखिर क्यों ?
महाजनी सूदखोर, सट्टा खाईवाल, अवैध कमोडिटी के चंगुल में फसा जिले का युवा परिस्थितियों के आगे घुटने टेक कर जहरखुरानी और फांसी लगाकर जान दे देने को ही अंतिम विकल्प मान बैठा है। पिछले 2 वर्षों में रायगढ़ में कल यह आठवीं आत्महत्या थी, जो सट्टे की भेंट चढ़ गई। जिस युवक ने कल आत्महत्या की उससे ऐसा करने की उम्मीद शहर में किसी को नहीं थी लिहाजा पूरा शहर सकते में है। ऐसा पहली बार हुआ कि अंतिम यात्रा में लोग सट्टे पर कार्रवाई करने के लिए तख्ती लेकर मुक्तिधाम तक गए। पर दूसरे मामलों की तरह इस मामले की भी फाइलिंग हो जाएगी और कुछ ही दिनों में सब कुछ वैसा ही चलने लगेगा जैसा चलता आया है।

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शहर को क्या हो गया है यह समझ से परे है। जिन थानेदारों से सवाल पूछे जाने चाहिए, सोशल मीडिया में उनका जन्मदिन मनाया जा रहा है। उन्हें दबंग का खिताब देकर उनका स्तुति गान किया जा रहा है। एक प्रतिस्पर्धा छिड़ी हुई है कि कौन सबसे अच्छा स्तुतिगान कर सकता है। राजनैतिक दल के कुछ युवा भी चारण भाट बने हुए है। कथित कुछ पत्रकारों का एक वर्ग भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है। छोटे-मोटे कर्तव्य का पालन कर दरोगा मसीहा बने घूम रहे है। पर्दे के पीछे चल रहे गोरखधंधे कि सबको खबर है पर कोई भी मुंह खोलने को तैयार नहीं है। इसी का नतीजा है शहर में सट्टे के अवैध कारोबार का पुष्पित और पल्लवित होना। वह पुलिस ही क्या जिसे अपने शहर के सट्टा खाईवालों और सटोरियों की खबर ना हो ? सब कुछ सबको पता है मगर संरक्षण नाम की भी एक चीज होती है जिस की छांव तले सब कुछ बड़ी सरलता और सहजता से चल रहा है और इसके काकस में फंसे युवा कराह रहे हैं। ज्यादातर मां बाप को इस बात का पता तब चलता है जब उसका नौनिहाल आत्महत्या जैसे कदम उठा लेता है। शॉर्टकट तरीके से अकूत धन कमाने के सब्जबाग देखकर युवा वर्ग तेजी से इस बुराई के चंगुल में फस रहा है। सटोरिये किसी आदमखोर अजगर की तरह युवा पीढ़ी को लील रहे हैं। मगर पुलिस अपनी संदिग्ध भूमिका के साथ हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

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जब सटोरिए और कबाड़ी लोगों से यह कहते फिरे कि थाने से संबंधित कोई काम होगा तो बताना तो समझिए शहर का अमन चैन खतरे में है। जब अपराधिक तत्व थानों की चारदीवारी में चाय पीते घूमते बेफिक्री से नजर आने लगे तो समझिए शहर का अमन चैन खतरे में है। जब गली मोहल्लों में नशे के सामान शराब गांजा धड़ल्ले से बिकने लगे तो समझिए शहर का अमन चैन खतरे में है। यक्ष प्रश्न है कि क्या हम हमारे शहर को उसके हालात पर छोड़ देंगे ? क्या नशे और सट्टे की गिरफ्त में यूं ही युवाओं की जान जाती रहेगी और हम मूकदर्शक बने रहेंगे ? फिर आखिर किया क्या जाए ? इस विषय पर हमको, आपको, हम सबको सोचने की जरूरत है, और कुछ करने की भी…।

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