अहंकार का अंत तय है: झरनीपारा में गूंजा रामायण का दिव्य संदेश, अखंड पाठ से उमड़ा भक्ति का सागर…
बिलाईगढ़। विकासखंड बिलाईगढ़ के ग्राम झरनीपारा में विश्व कल्याण की भावना के साथ ग्रामवासियों द्वारा पंचदिवसीय अखंड रामायण पाठ का भव्य आयोजन किया गया। पूरे आयोजन के दौरान गांव का वातावरण भक्तिमय हो गया, जहां हर ओर राम नाम की गूंज और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला।
रविवार को महानदी क्षेत्र के प्रसिद्ध रामायणी एवं मानस प्रवक्ता श्यामसुंदर पटेल (ग्राम बांसउरकुली) ने अपनी ओजस्वी वाणी में रामकथा का रसपान कराया। उन्होंने अपने सारगर्भित प्रवचन में कहा कि अहंकार व्यक्ति के पतन का सबसे बड़ा कारण है। यह एक ऐसा अवगुण है, जो अकेले ही सभी सद्गुणों को नष्ट कर देता है, इसलिए मनुष्य को कभी भी किसी बात का घमंड नहीं करना चाहिए।
उन्होंने संत गोस्वामी तुलसीदास के विनय पत्रिका का उल्लेख करते हुए बताया कि मन का मोह ही रावण, अहंकार ही कुंभकरण और काम ही मेघनाथ है, जो मनुष्य के भीतर ही निवास करते हैं।
कथा के दौरान उन्होंने राम-रावण युद्ध का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब रावण की आधी सेना नष्ट हो गई, तब उसने अपने भाई कुंभकरण को जगाकर युद्ध में शामिल होने के लिए कहा। कुंभकरण ने पहले रावण को सीता हरण के लिए फटकार लगाई, लेकिन उसके स्वभाव के अनुसार वह अंततः युद्ध के लिए तैयार हो गया। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि अहंकारी व्यक्ति का व्यवहार भी ऐसा ही होता है—वह कहता कुछ है और करता कुछ और है।
प्रवचन में उन्होंने यह भी बताया कि कुंभकरण अकेले ही करोड़ों वानरों का संहार करता है, जो इस बात का प्रतीक है कि अहंकार एक ऐसा दोष है जो व्यक्ति के भीतर के सभी सद्गुणों को निगल जाता है। उन्होंने कहा कि चाहे व्यक्ति कितनी भी पूजा-पाठ, यज्ञ, कथा या कीर्तन कर ले, यदि उसके भीतर अहंकार है तो वह भगवान की कृपा और शांति से दूर ही रहेगा।
उन्होंने भक्त कवियों की पंक्तियां उद्धृत करते हुए कहा—
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं,
प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं।”
अर्थात जब तक मन में अहंकार रहता है, तब तक भगवान का वास नहीं होता। अहंकार का नाश केवल ईश्वर की कृपा से ही संभव है और उसी के बाद व्यक्ति को सच्ची शांति की प्राप्ति होती है।
कार्यक्रम के दौरान ग्रामवासियों ने श्रद्धा भाव से कथा श्रवण किया और सत्संग, नाम जप एवं भगवान की भक्ति को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना, बल्कि समाज को नैतिकता, विनम्रता और आध्यात्मिकता का गहरा संदेश भी दे गया।
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