“जहरीली राख से सुलगती जमीन” — घरघोड़ा में फ्लाई ऐश कांड, NGT नियमों की उड़ रही धज्जियाँ, गरीब किसानों की जमीन पर कब्जे का खेल!
रायगढ़/घरघोड़ा। एक ओर सरकारें वातानुकूलित कमरों में बैठकर पर्यावरण संरक्षण और किसानों के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों को पूरी तरह बेनकाब कर रही है। घरघोड़ा ब्लॉक के नावपारा टेड़ा क्षेत्र से सामने आए मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था और नियमों की पोल खोल दी है। यहां खुलेआम National Green Tribunal (NGT) के नियमों को दरकिनार कर कृषि भूमि पर फ्लाई ऐश (जहरीली राख) का निपटान किया जा रहा है।
जिस जमीन पर हरियाली लहलहानी चाहिए थी, वहां अब राख के ढेर नजर आ रहे हैं। यह वही भूमि है जिसे सरकार भूमिहीन किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आवंटित कर रही है, लेकिन अब उसी पर रसूखदारों की नजर और कब्जे की साजिश साफ दिखाई दे रही है।
मंत्री के दावे बनाम जमीनी सच्चाई
हाल ही में विधानसभा में वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने फ्लाई ऐश निपटान को लेकर मॉडल SOP लागू करने की बात कही थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वन भूमि और कृषि भूमि पर राख डालना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
लेकिन घरघोड़ा की तस्वीरें इन दावों को सीधी चुनौती दे रही हैं। सवाल उठ रहा है—क्या प्रशासन मंत्री के निर्देशों को नजरअंदाज कर रहा है या फिर नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
“अजब तहसीलदार, गजब पटवारी” — सिस्टम पर सवाल
इस पूरे मामले में स्थानीय राजस्व अमले की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
नायब तहसीलदार का तर्क: खसरा नंबर 311/4 पर पर्यावरण स्वीकृति के बाद कार्य होने की बात कही गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यावरण अनुमति का मतलब कृषि भूमि को बर्बाद करना है?
पटवारी का बयान: पटवारी लोकेश पैकरा ने माना कि भूमि कृषि है और आसपास खेती हो रही है, लेकिन रिपोर्ट में ऐसा कोई कॉलम नहीं था जिसमें आसपास की खेती का उल्लेख किया जा सके।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या नियम केवल कागजी कॉलम तक सीमित हो गए हैं?
अगर फॉर्म में कॉलम नहीं है, तो क्या जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया जाएगा?
जहरीली राख से खतरे में जीवन और जमीन
फ्लाई ऐश का यह अवैध निपटान न सिर्फ मिट्टी की उर्वरता खत्म कर रहा है, बल्कि आसपास के ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल रहा है। हवा में घुलती राख लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रही है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
अब कार्रवाई या फिर ‘मैनेजमेंट’ का खेल?
इस पूरे मामले ने प्रशासन, राजस्व अमले और उद्योगों की मिलीभगत पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस गंभीर मामले पर क्या कार्रवाई करते हैं—
या फिर रसूखदारों का “मैनेजमेंट” इसी तरह नियमों को ठेंगा दिखाता रहेगा।
फिलहाल, गरीब किसान अपनी ही जमीन पर बेबस खड़े हैं… और जहरीली राख उनकी उम्मीदों को धीरे-धीरे निगल रही है।


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