सारंगढ़-बिलाईगढ़ | अगर आप चंद्रपुर-सरिया या नौघटा मार्ग पर सफर कर रहे हैं, तो अपनी सुरक्षा का जिम्मा ‘ऊपर वाले’ पर छोड़ दीजिए। क्योंकि यहाँ की सड़कों पर बिछे नुकीले पत्थर चीख-चीख कर बता रहे हैं कि नियम और जमीन की हकीकत के बीच का फासला कितना गहरा है।

‘बिना नंबर’ वाले यमदूत और मौन विभाग*

क्षेत्र की सड़कों पर बिना रजिस्ट्रेशन नंबर के दौड़ते ट्रैक्टर-ट्रॉली किसी ‘अदृश्य शक्ति’ के संरक्षण का अहसास कराते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि कृषि कार्य के लिए पंजीकृत वाहन जब खनिज संपदा ढोते हुए सड़कों पर पत्थर बिखेरते हैं, तब संबंधित विभागों की ‘चुप्पी’ शोध का विषय बन जाती है। क्या यह चुप्पी किसी ‘मजबूरी’ का परिणाम है या फिर ‘नजरअंदाज’ करने की कला का उत्कृष्ट उदाहरण?
‘विकास’ के नाम पर बिखरा ‘विनाश’-
कटंगपाली और बरमकेला क्षेत्र में डोलोमाइट परिवहन की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे किसी ‘जंगलराज’ से कम नहीं लगतीं। बिना तिरपाल के ओवरलोड दौड़ते इन वाहनों से गिरते पत्थर राहगीरों के लिए ‘जानलेवा सरप्राइज’ साबित हो रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आक्रोश अब उस सीमा पर है जहाँ उन्हें प्रशासन की ‘कुंभकर्णी कार्यशैली’ पर संदेह होने लगा है।
क्या प्रशासन को ‘बड़े हादसे’ की प्रतीक्षा है?
ग्रामीणों का सवाल सीधा है—जब नियम सबके लिए समान हैं, तो इन बेलगाम ट्रैक्टरों पर ‘लगाम’ क्यों नहीं? क्या परिवहन और खनिज विभाग की फाइलें केवल मेजों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं? सड़कों की हालत देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो यहाँ ‘सड़क सुरक्षा’ जैसे शब्द केवल किताबों तक सीमित रह गए हैं।
“लगता है जिले के आला अधिकारी ‘वर्क फ्रॉम होम’ के इतने आदी हो गए हैं कि उन्हें सड़कों पर बिखरे ये ‘उपहार’ नजर ही नहीं आते। जनता धूल फांक रही है, पत्थर झेल रही है और जिम्मेदार शायद इस उम्मीद में हैं कि पत्थर खुद-ब-खुद सड़क से चलकर खदान वापस चले जाएंगे!”
प्रशासन के लिए ‘चुभते’ हुए सवाल-
बिना नंबर और बिना लाइसेंस के दौड़ रहे वाहनों पर ‘मेहरबानी’ का सूत्रधार कौन है?
क्या सड़कों को ‘पत्थरों का मैदान’ बनने देना ही नए भारत की नई विकास गाथा है?
अगर कल कोई बड़ी अनहोनी होती है, तो क्या विभाग उसकी ‘नैतिक जिम्मेदारी’ स्वीकार करेगा?
यह समाचार किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘लचर व्यवस्था’ के खिलाफ एक आईना है जो आम आदमी की जान की कीमत को शायद पहचान नहीं पा रही है। उम्मीद है प्रशासन ‘जागेगा’… या कम से कम ‘आंखें’ तो खोलेगा!
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