जहां देवी ने किया था ‘नकटा’ दानव का वध, जानें पीलीभीत के इस प्राचीन मंदिर का इतिहास…
पीलीभीत जिले में स्थित माता यशवंतरी देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अटूट आस्था और गौरवशाली इतिहास का केंद्र है. शहर के बीचों-बीच स्थित यह मंदिर अपनी पौराणिक कथाओं और चमत्कारिक मान्यताओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है.
मंदिर महंत पं राजेश बाजपेई ने बताया प्राचीन काल में पीलीभीत का यह क्षेत्र नकटा नामक एक क्रूर राक्षस के आतंक से ग्रस्त था. वह राक्षस निर्दोष ग्रामीणों और मवेशियों को अपना शिकार बनाता था. तब क्षेत्रवासियों ने इस संकट से मुक्ति पाने के लिए मां भगवती की कठोर आराधना की. भक्तों की पुकार सुनकर माता ने यशवंतरी देवी के रूप में अवतार लिया और इसी स्थान पर उस भीषण राक्षस का वध कर धर्म की स्थापना की.
देवी की इसी विजय और यश के कारण इस स्थान का नाम यशवंतरी पड़ा. इस मंदिर की सबसे खास मान्यता उत्तराखंड के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां पूर्णागिरि से जुड़ी है. माना जाता है कि पूर्णागिरि की यात्रा तब तक अधूरी रहती है, जब तक भक्त वापसी में माता यशवंतरी के दरबार में हाजिरी नहीं लगाते. यही कारण है कि साल भर यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. मंदिर के वर्तमान स्वरूप के बारे में कहा जाता है कि इसका जीर्णोद्धार लगभग 100 से 150 वर्ष पूर्व किया गया था, लेकिन इसकी शक्तिपीठ के रूप में पहचान सदियों पुरानी है.
मंदिर परिसर में आज भी वे प्राचीन शस्त्र और बर्तन मौजूद हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि माता ने असुर वध के समय इनका उपयोग किया था. श्रद्धालु इन शस्त्रों के दर्शन को अत्यंत फलदायी मानते हैं. चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहाँ का दृश्य भव्य होता है. नौ दिनों तक यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जहाँ उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से भी हजारों भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुँचते हैं. भक्तों का विश्वास है कि माता के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता.
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