भटगांव का ‘अड़बंधा’ कांड: क्या रसूख की भेंट चढ़ेगी नगर की जीवन रेखा?सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और विभागीय शर्तों पर ‘सिस्टम’ का प्रहार!
सारंगढ़/भटगांव। जल संरक्षण के सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला होता है, इसका ज्वलंत उदाहरण नगर पंचायत भटगांव का ‘अड़बंधा तालाब’ मामला बनता जा रहा है। नगर के प्रमुख निस्तारी साधन को पाटकर वहां व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा करने की ‘कथित’ तैयारी ने न केवल जनभावनाओं को आहत किया है, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देशों को भी चुनौती दे दी है।
सवाल: क्या हवा में लटकेंगी 58 दुकानें?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा तकनीकी और कानूनी यक्ष प्रश्न यह है कि जब सिंचाई विभाग ने NOC देते समय स्पष्ट निर्देशित किया है कि “तालाब के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं होगी”, तो फिर नगर पंचायत वहां 58 दुकानों का निर्माण कैसे करेगी? क्या प्रशासन के पास ऐसी कोई तकनीक है जिससे जलराशि को छुए बिना हवा में दुकानें तान दी जाएं? यदि नहीं, तो यह सीधे तौर पर विभागीय शर्तों का उल्लंघन और जनहित के साथ बड़ा छल प्रतीत होता है।
पारदर्शिता का ‘दम’ घोंटती गोपनीय प्रक्रिया!-
भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारियों—बद्री, दादूराम, नारायण साहू, नकुल प्रधान और अन्य नेताओं ने प्रभारी मंत्री को सौंपे ज्ञापन में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रहार किया है। आरोप है कि
गोपनीयता का खेल:
बिना किसी सार्वजनिक सूचना या पारदर्शी निविदा के आखिर दुकानों के आवंटन की ‘अंदरूनी’ खिचड़ी किसके लिए पक रही है?
राजस्व पर डाका: 5 से 7 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व की हानि का अंदेशा जताते हुए इसे एक सुनियोजित वित्तीय षड्यंत्र बताया जा रहा है।
संवैधानिक अवहेलना: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि तालाबों का संरक्षण राज्य की जिम्मेदारी है, तो क्या भटगांव प्रशासन खुद को संविधान से ऊपर मानता है?
सिस्टम की चुप्पी और गहराता संदेह-
जिस तरह से इस निर्माण कार्य को लेकर नगरवासियों के बीच असंतोष है और भाजपा मंडल ने इसे “प्रदेश का सबसे बड़ा षड्यंत्र” करार दिया है, उससे नगर पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध नजर आती है। चिन्हित व्यक्तियों से ‘कथित’ लेन-देन के आरोपों ने इस मामले को और भी संगीन बना दिया है।
विकास या विनाश का सौदा?
तालाब को पाटकर दुकानें बनाना ‘विकास’ नहीं, बल्कि पर्यावरण और नगर की जल-सुरक्षा का ‘विनाश’ है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उन्होंने मंत्री महोदय से मांग की है कि इस ‘अदृश्य निविदा’ पर तत्काल रोक लगाकर मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए।
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