कलेक्टरी छोड़ने पर जिनको जग ने हंसा उसी ने इतिहास रचा: सब कुछ जानकर विचलित ना होना और अपनी लाइन में बढ़ते रहना ओपी की खासियत…

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रायगढ़। ओपी चौधरी को अभी लंबा सफर तय करना है। वह हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। वह बड़े आदमी हैं राजनीति में बड़ा बनने की योग्यता उन्होंने ऐतिहासिक रूप से दर्ज की। उनको लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं जिस पर उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अफवाहों पर विराम लगाने की अपील की है। खैर, इस बार उनके चुनावी अभियान में रोड़ा डालने वालों में ज्ञात विरोधियों के अलावे अज्ञात अपने भी थे। वह 2018 की हार से इस गणित को समझ चुके थे। हार माने थे पर रार नहीं ठाने थे। उन्होंने तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी न शायद अब दें। उन्हें आगे जाना है इन बातों के लिए उनके पास समय नहीं। जब समय आएगा वह इससे निपटना भली-भांति जानते हैं। तब तक जिसकी छाती पर सांप लोट रहा है लोटने दो की लाइन पकड़ ली गई है।

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2018 में हार के बाद उनका मनोबल न टूटे इसलिए भाजपा संगठन ने उन्हें प्रदेश भर में विभिन्न कार्य कराए, संगठन में महामंत्री का पद दिया। वह नि:स्वार्थ भाव से कार्य करते रहे, लोकसभा में जाने की बात चली पर उस रास्ते से पर ज्यादा फोकस नहीं किया। 15 साल बाद विपक्ष में आई भाजपा के पोस्टर ब्वॉय बनकर राज्य स्तरीय राजनीति में मशगूल रहे और अपने गृह जिले रायगढ़ में सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाई।

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ओपी के भाषण को सुनने और उन्हें देखने के लिए लोग आते रहे। वह प्रियदर्शी तो नहीं पर उनकी प्रतिभा और योग्यता उनकी चोबदारी करती रही। रायगढ़ में जब जरूरत हुई वह मौजूद थे। धान खरीदी में अनियमितता पर जब जमीन पर बैठकर वह कांग्रेस विरोधी नारे लगा रहे थे तो कुछ नेताओं ने उन पर फब्तियां भी कसी कि हारे आईएएस का यही हश्र होता है। राज्यसभा में जाने की बात कही गई पर ओपी यह सब भूल गए और आगे फोकस किया। यूरिया खाद के मामले में विरोध हो या फिर गोठान का विरोध हो, पूरे प्रदेश में ओपी ने अपनी एक दमदार छवि गढ़ी।
जब रायगढ़ से भाजपा ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया तो वर्ग विशेष के नेताओं ने उन्हें डराने की कोशिश की पर ओम के प्रकाश ने सब अंधेरा दूर कर दिया। जिस दिन से उन्हें प्रत्याशी बनाया गया उसी दिन से वह अपने अनोखे जनसंपर्क में जुट गए और सभी अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया। पूरे प्रदेश में ओपी का जनसंपर्क और प्रबंधन खास तो रहा ही वृहद भी था। बड़ों का आशीर्वाद और छोटे से गर्मजोशी से मुलाकात ने उन्हें हर घर का नेता बना दिया। सुबह से दोपहर शहर तो तीसरे पहर से देर रात तक ग्राम भ्रमण की रणनीति से ओपी व्यापक रूप से प्रचार कर पाए। सोशल मीडिया से लेकर मैदानी प्रचार-प्रसार में ओपी उनकी टीम और भाजपा संगठन ने जितनी मेहनत की प्रदेश में शायद इनका 20 फीसद कोई कर पाया हो। वह लो प्रोफाइल मेंटेंन कर अपनी सीधी लकीर पर आगे बढ़ते रहे।

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भाजपा ने भी उनके सकारात्मक नैरेटिव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक पढ़ा लिखा, ईमानदार,पूर्व आईएएस और दूरदृष्टा नेता के रूप में उनकी छाप ऐसी पड़ी जिससे प्रभावित होकर आम जनता भी उनके लिए एक कार्यकर्ता की भूमिका में नजर आने लगा। इसका सुबूत 3 दिसंबर नतीजे वाले दिन की दोपहर से देर रात तक छूटे पटाखों ने दे दिया, दीवाली से ज्यादा पटाखे छूटे। जीतने के बाद जब मतगणना केंद्र से वह भाजपा कार्यालय आये तो 10 मिनट की दूरी 4 घंटे में बदल गई हर चौक-चौराहे पर उनका लोगों ने स्वागत किया। आमजन भी उन्हें देखने के लिए सड़कों पर थे। ओपी शालीनता से सभी का अभिवादन स्वीकरते और धन्यवाद ज्ञापित करते यह बोलने से नहीं चूक रहे थे कि आपने ही मुझे जिताया है आप हैं तो मैं हूं।

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ऐतिहासिक जीत के पीछे भाजपा का संगठित होकर चुनाव लड़ना था, कुछ भीतरघातियों की चाल कामयाब नहीं रही क्योंकि ओपी की छवि के आगे सब नगण्य थे। कांग्रेस सरकार में रायगढ़ की उपेक्षा और विकास के कोई कदम नहीं उठाये जाने का मुद्दा जहां ओपी के पक्ष में गया तो वहीं कांग्रेस की अंतर्कलह उसे ले डूबी। फिर चाहे वह नगर निगम की राजनीति हो या फिर कांग्रेस के स्थानीय संगठन में खींचतान। बीते लोकसभा चुनाव के आधार पर बीजेपी रायगढ़ में 35,000 वोटों से बढ़त पर थी। ओपी के नेतृत्व और उनके व्यक्तित्व ने इसे 64,443 की बढ़त में तब्दील कर दिया। जिसके कारण ओपी को प्रदेश में सर्वाधिक 1 लाख 29 हजार 134 वोट मिले और यह जीत करिश्माई हो गई इससे बड़ा आदमी बनने का रहा प्रशस्त हो गया।

युवाओं में ओपी को लेकर जबरदस्त क्रेज है। चुनाव के समय युवाओं का ओपी के प्रति धुव्रीकरण ने एक बड़ा योगदान दिया। नए वोटर्स ने भी ओपी पर विश्वास दिखाया और महिलाओं ने खुलकर ओपी का समर्थन किया। ओपी ने दीवाली के दिन रायगढ़ को लेकर अपना विजन जारी किया था जिस पर फोकस रहने की बात जीत के बाद कर चुके हैं। बायंग का लड़का सर बना फिर नेता अब आने वाला समय बताएगा कि ओपी को भाजपा शीर्ष नेतृत्व विधायक के साथ-साथ और क्या जिम्मेदारी सौंपती है।

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