गम्भीर मरीजों को कोविड निगेटिव होने के बाद भी क्यों पड़ रही है 10 से 15 दिनों तक वेंटिलेटर या क्रिटिकल केयर की आवश्यकता…पढ़िए खास रिपोर्ट

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जगन्नाथ बैरागी

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रायपुर। कोरोना की दूसरी लहर में चौंकाने वाली बात सामने आ रही है। राज्य में गंभीर रूप से बीमार मरीजों में कोविड निगेटिव होने के बाद भी उन्हें 10 से 15 दिनों तक वेंटिलेटर या क्रिटिकल केयर की आवश्यकता पड़ रही है। वहीं इसमें से कई मरीजों के स्वस्थ होकर घर जाने के बाद हार्ट अटैक या ब्रेन हेमरेज से मौत के मामले भी सामने आ रहे हैं।

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चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना के गंभीर रूप से पीड़ित मरीज जो आईसीयू, वेंटिलेटर पर होते हैं। इलाज के बाद फेफड़े, हृदय समेत शरीर के अलग अलग अंगों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में कोविड रिपोर्ट निगेटिक भले आ जाती है, लेकिन स्थिति गंभीर बनी होती है।

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आईसीयू, वेंटिलेटर पर पहुंचने वाले 50 फीसद मरीज ऐसे ही होते हैं।

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वहीं, कुछ मरीज स्वस्थ होकर घर जाने के बाद उनकी हार्ट अटैक या ब्रेन हेमरेज से मौत हो रही। चिकित्सकों के मुताबिक इस तरह की दिक्कत शरीर के अंदर अंगों के आसपास खून के थक्के जम जाने की वजह से होता है। इसके लिए पोस्ट कोविड के मरीजों को खून पतला करने की दवाएं और फालोअप जांच की जाती है।

*दवाओं के हाई डोज ने बढ़ाई दिक्कत*

चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि कोविड के दौरान दवाओं के हाई डोज कोविड मरीजों के लिए समस्या बन गई है। स्टेरायड, हाईडोज दवा इंजेक्शन के चलते मरीजों को कोविड निगेटिक होने के बाद भी इसका असर रहता है। इसकी वजह से रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। जो मरीजों को जल्द स्वस्थ होने के रास्ते रोड़ा बन जाता है।

चिकित्सकों ने बताया कि दवाओं के हाई डोजस्वस्थ होने के बाद हार्ट अटैक या अन्य कारणों का जिम्मेदार नहीं है। लेकिन ब्लैक फंगस का सबसे बड़ा भी यही है। जो अनियंत्रित शुगर, बीमारी से जूझ रहे संक्रमितों में स्वस्थ होने के बाद सामने आता है।

एम्स और आम्बेडकर अस्पतालों में केस बिगड़कर भेज रहे प्राइवेट अस्पताल

इधर, एम्स और आम्बेडकर अस्पतालों में कोरोना संक्रमितों के ऐसे केस ज्यादा रेफर किये जा रहे हैं, जिनकी स्थिति काफी खराब हो जा रही है। यह केस प्राइवेट अस्पतालों के रेफरल मामले होते हैं। केस से सबंधित मामले में सामने आ रहा है कि कई प्राइवेट अस्पतालों में कोरोना मारीजों को अनावश्यक हाई डोज दवाएं दी जा रही हैं। वहीं कोरोना के गंभीर रोगियों को गाइडलाइन के हिसाब से इलाज नहीं हो रहा है। वहीं शासन द्वारा कोविड के इलाज की मान्यता दिए कई अस्पतालों में प्रशिक्षित डॉक्टर, स्टाफ का न होना भी ऐसे मामले बढ़ाने के कारण हैं।

ब्लैक फंगस जैसी बीमारी हो रही

50 फीसद तक कोविड क्रिटिकल केयर के मरीजों को टेस्ट निगेटिव आने के बाद भी करीब 10-15 दिनों तक भी आईसीयू, वेंटिलेटर की जरूरत पड़ रही। इसका कारण संक्रमण अधिक होने से यह फेफड़े, हृदय समेत कई अंगों को नुकसान पहुंचाने की वजह से है। हाईडोज की वजह से प्रतिरोधक क्षमता कम होने से ब्लैक फंगस जैसी बीमारी हो रही है। देखा जा रहा है कि प्राइवेट अस्पतालों रेफरल केस ज्यादा आ रहे हैं। इसमें मरीजों को कई बार अनावश्यक दवाओं का डोज दे दिए जाने के मामले सामने आ रहे हैं, जिससे स्थिति खराब रहती है। गाइड लाइन के अनुसार ही इलाज जरूरी होता है।

डॉक्टर अतुल जिंदल, यूनिट इंचार्ज (कोविड-19), एम्स

मौत के मामलों में ये रही वजह

गंभीर कोरोना मरीजों की रिपोर्ट निगेटिव आ जाने के बाद भी कई दिनों तक वेंटिलेटर की जरूरत पड़ रही है। क्योंकि बीमारी की वजह मरीज़ों की स्थिति काफी खराब रहती है। यह अधिक उम्र वालों, किसी बीमारी से गंभीर रूप से पीड़ित मरीजों में यह दिक्कतें आती है। कई मरीजों के स्वस्थ होने के बाद मौत होने के मामले हैं उनमें हृदय, ब्रेन, फेफड़ों में खून के थक्के जमने की वजह हार्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज, लकवा की शिकायत है। लेकिन ये मामले काफी कम हैं।

ओपी सुंदरानी, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ, आम्बेडकर अस्पताल

पोस्ट कोविड सिंड्रोम की समस्या

गंभीर कोविड मरीजों में पोस्ट कोविड सिंड्रोम की वजह से समस्याएं आ रही है। इसमें संक्रमण शरीर के कई हिस्सों को डेमेज के देता है। इसलिए निगेटिव होने के बाद भी इलाज चलता है। जहां तक दवाओं के हाई डोज की बात है तो किसी भी दवाओं की अधिकता शरीर को नुकसान पहुंचता है। इसकी वजह से प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाता है। इसकी ब्लैक फंफस की दिक्कत भी सामने आ रही है।

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