छत्तीसगढ़ के कोंडागांव के ग्राम पावड़ा से होकर बहने वाली बारदा नदी की सात धाराओं के बीच स्थित शिवलिंग क्षेत्रवासियों के बीच अगाध आस्था का केंद्र है, जहां प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर विशाल मेला लगता है।
पुरातत्वविदों के मुताबिक ग्राम पावड़ा में स्थित शिव मंदिर का रामायण काल से उल्लेख मिलता है। जहां पर हलबा समाज के बलदेव प्रधान ने वर्ष 1981-82 में मंदिर का निर्माण कराया था।

कोंडागांव में नदी के सात धाराओं के बीच है यह शिवलिंग

कोंडागांव जिला अंतर्गत फरसगांव विकास खंड के ग्राम ड़ोंगर से 12 किलोमीटर दूर ग्राम पावड़ा स्थित है। यहां गांव से होकर बहने वाली बारदा नदी सात धाराओं में विभक्त होती है। जिसे स्थानीय ग्रामीण सातधार के नाम से भी जानते हैं। नदी के इन्हीं सात धाराओं के बीच एक टापू पर भगवान शंकर का शीला सदियों से स्थित है।
मंदिर को लेकर कई तरह की किंवदंतियां जुड़ी
बताया जा रहा द्वापर युग में ग्राम पावडा हल्बा जाति के लोगों की बस्ती थी। हल्बा परिवार से एक व्यक्ति हमेशा मछली मारने के लिए नदी में आया करता था। कभी नदी में मछली पकड़ता या कभी नहीं पकड़ पाता। एक दिन मछली न पकड़ने से उदास होकर वापस चला जा रहा था। वापस जाते हुए उसे सामने से नंदी में विराजमान भगवान शंकर कमंडल लेकर आते हुए दिखाई दिये तो उन्होंने अपनी मछली के जाल को छोड़कर भगवान शंकर से मन्नत मांगने बैठ गया तथा उन्होंने भगवान से यह वरदान मांगा कि मछली मारने के लिए मुझे ना जाना पड़े। मेरे बुलाने पर ही मछली आ जाएं तो शंकर भगवान ने आशीर्वाद देकर उसकी मनोकामना पूरी की।
मंदिर का दूसरा किदवंती यह भी है कि रामायण काल में खर-दूषण नामक राक्षस इस क्षेत्र में राज्य करता था। तथा वह लगान वसूली करने के लिए यहां आता था। आने से पहले इस मंदिर के नीच कुछ दूरी पर छेचान चोंढ़ी नामक स्थान में बहादुर कलारिन शराब बनाती थी। खर-दूषण जहां से शराब लेकर शिव मंदिर में पूजा करने आता और भगवान शंकर की आराधना कर शराब शिवलिंग में अर्पित करता था। फिलहाल नदी के बीचोबीच विशालकाय पत्थर के ऊपर पत्थर पर शराब भट्टी की आकृति निर्मित है।
मंदिर पुजारी के मुताबिक अपनी मनोकामना लेकर आने वाले श्रद्धालुओं की भगवान भोलेनाथ इच्छाएं पूरी करते हैं। मंदिर में निःसंतान दंपत्ति भी मन्नत मांगने आते हैं जो कुंड से पानी लाकर भगवान शंकर पार्वती को अर्पित कर मंदिर परिसर में स्थित गोमुख कुंड सहित पांच अलग-अलग कुंड़ों में बेलपान जल और शहद दूध अर्पित करते हैं।
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