नही रहे “ट्रेजडी किंग” दिलीप कुमार..जानिए उनके निजी जीवन और फ़िल्मी सफर के बारे में संक्षिप्त जानकारी….

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जगन्नाथ बैरागी

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हिंदी सिनेमा जगत के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार का लंबी बीमारी के बाद 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया है. दिलीप कुमार के अचानक निधन से बॉलीवुड में शोक का माहौल है. सोशल मीडिया पर सेलेब्स से लेकर फैंस तक सभी दिलीप कुमार को श्रद्धांजलि दे रहे हैं. बॉलीवुड में ‘ट्रेजिडी किंग’ के नाम से मशहूर दिलीप कुमार ने पांच दशकों तक अपने शानदार अभिनय से दर्शकों के दिल पर राज किया है. दिलीप कुमार पर फिल्माया गया गाना ‘नैना जब लड़िहें तो भैया मन मा कसक होयबे करी’ को भला कौन भूल सकता है! 11 दिसंबर 2020 को दिलीप कुमार ने अपना 98वां जन्मदिन मनाया था.
दिलीप कुमार को भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा दिलीप कुमार को पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी सम्मानित किया गया है. पेशावर (अब पाकिस्तान में) में 11 दिसंबर, 1922 को जन्में दिलीप कुमार का असली नाम मुहम्मद यूसुफ खान है. दिलीप कुमार के पिता फल बेचा करते थे मकान का कुछ हिस्सा किराए पर देकर गुजर-बसर करते थे. भारत आने के बाद दिलीप कुमार ने नासिक के पास एक स्कूल में पढ़ाई की थी.

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मेला, शहीद, अंदाज, आन, देवदास, नया दौर, मधुमती, यहूदी, पैगाम, मुगल-ए-आजम, गंगा-जमना, लीडर तथा राम और श्याम जैसी फिल्मों के सलोने नायक दिलीप कुमार स्वतंत्र भारत के पहले दो दशकों में लाखों युवा दर्शकों के दिलों की धड़कन बन गए थे। अब तक भारतीय उपमहाद्वीप के करोड़ों लोग पर्दे पर उनकी चमत्कारी अभिनय कला का जायजा ले चुके हैं।
सभ्य, सुसंस्कृत, कुलीन इस अभिनेता ने रंगीन और रंगहीन (श्वेत-श्याम) सिनेमा के पर्दे पर अपने आपको कई रूपों में प्रस्तुत किया। असफल प्रेमी के रूप में उन्होंने विशेष ख्याति पाई, लेकिन यह भी सिद्ध किया कि हास्य भूमिकाओं में वे किसी से कम नहीं हैं। वे ट्रेजेडी किंग भी कहलाए और ऑलराउंडर भी।
उनकी गिनती अतिसंवेदनशील कलाकारों में की जाती है, लेकिन दिल और दिमाग के सामंजस्य के साथ उन्होंने अपने व्यक्तित्व और जीवन को ढाला।

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वे अपने आप में सेल्फमेडमैन (स्वनिर्मित मनुष्य) की जीती-जागती मिसाल थे। उनकी ‘प्राइवेट लाइफ’ हमेशा कौतुहल का विषय रही, जिसमें रोजमर्रा के सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव, मिलना-बिछुड़ना, इकरार-तकरार सभी शामिल थे। ईश्वर-भीरू दिलीप कुमार को साहित्य, संगीत और दर्शन की अभिरुचि ने गंभीर और प्रभावशाली हस्ती बना दिया।

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पच्चीस वर्ष की उम्र में दिलीप कुमार देश के नंबर वन अभिनेता के रूप में स्थापित हो गए थे। वह आजादी का उदयकाल था। शीघ्र ही राजकपूर और देव आनंद के आगमन से ‘दिलीप-राज-देव’ की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति का निर्माण हुआ। ये नए चेहरे आम सिने दर्शकों को मोहक लगे। इनसे पूर्व के अधिकांश हीरो प्रौढ़ नजर आते थे- सुरेंद्र, प्रेम अदीब, मोतीलाल आदि।

दिलीप कुमार प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टॉकिज की उपज हैं, जहाँ देविका रानी ने उन्हें काम और नाम दिया। यहीं वे यूसुफ सरवर खान से दिलीप कुमार बने और यहीं उन्होंने अभिनय का ककहरा सीखा। अशोक कुमार और शशधर मुखर्जी ने फिल्मीस्तान की फिल्मों में लेकर दिलीप कुमार के करियर को सही दिशा में आगे बढ़ाया।

फिर नौशाद, मेहबूब, बिमल राय, के. आसिफ तथा दक्षिण के एसएस वासन ने दिलीप की प्रतिभा का दोहन कर क्लासिक फिल्में देश को दीं। 44 साल की उम्र में अभिनेत्री सायरा बानो से विवाह करने तक दिलीप कुमार वे सब फिल्में कर चुके थे, जिनके लिए आज उन्हें याद किया जाता है। बाद में दिलीप कुमार ने कभी काम और कभी विश्राम की कार्यशैली अपनाई। वैसे वे इत्मीनान से काम करने के पक्षधर शुरू से थे। अपनी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को दिलीप कुमार ने पैसा कमाने के लिए कभी नहीं भुनाया। एक बड़े परिवार के संचालन की जिम्मेदारी उन पर थी।

मान-सम्मान के महानायक

आज ज्यादातर लोगों को इस बात पर आश्चर्य होता है कि इस महानायक ने सिर्फ 54 फिल्में क्यों की। लेकिन इसका उत्तर है दिलीप कुमार ने अपनी इमेज का सदैव ध्यान रखा और अभिनय स्तर को कभी गिरने नहीं दिया। इसलिए वे अभिनय के पारसमणि (टचस्टोन) बने हुए थे जबकि धूम-धड़ाके के साथ कई सुपर स्टार, मेगा स्टार आए और आकर चले गए।

दिलीप कुमार ने अभिनय के माध्यम से राष्ट्र की जो सेवा की, उसके लिए भारत सरकार ने उन्हें 1991 में पद्‍मभूषण की उपाधि से नवाजा था और 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘दादा साहब फालके अवॉर्ड’ भी प्रदान किया। पाकिस्तान सरकार ने भी उन्हें 1997 में ‘निशान-ए-इम्तियाज’ से नवाजा था, जो पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

1953 में फिल्म फेयर पुरस्कारों के श्रीगणेश के साथ दिलीप कुमार को फिल्म ‘दाग’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार‍ दिया था। अपने जीवनकाल में दिलीप कुमार कुल आठ बार फिल्म फेयर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार पा चुके हैं और यह एक कीर्तिमान है जिसे अभी तक तोड़ा नहीं जा सका। अंतिम बार उन्हें सन् 1982 में फिल्म ‘शक्ति’ के लिए यह इनाम दिया गया था, जबकि फिल्म फेयर ने ही उन्हें 1993 में राज कपूर की स्मृति में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया।

फिल्म फेयर ने जिन छह अन्य फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया वे हैं आजाद (1955), देवदास (1956), नया दौर (1957), कोहिनूर (1960), लीडर (1964) तथा राम और श्याम (1967)। 1997 में उन्हें भारतीय सिनेमा के बहुमूल्य योगदान देने के लिए एनटी रामाराव अवॉर्ड दिया गया, जबकि 1998 में समाज कल्याण के क्षेत्र में योगदान के लिए रामनाथ गोयनका अवॉर्ड दिया गया।

अभिनेता के साथ नेता:-

इसी दुर्घटना के कारण दिलीप कुमार के परिवार को मुंबई शिफ्‍ट होना पड़ा और जब मुंबई की जलवायु उसके उपचार के प्रतिकूल पाई तो सरवर खान ने परिवार को देवलाली में रखा। पहले वे किराए के मकान में रहे और बाद में बंगला बनाया। यूसुफ ने देवलाली में बर्नेस और मुस्लिम बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई की। बीमार अय्यूब ने घर में रहकर ही पढ़ाई की। 16 साल की उम्र में अय्यूब ने नासिक में पैगम्बर मोहम्मद के जीवन पर एक सभा में 45 मिनट तक भाषण दिया और उसकी खूब सराहना हुई। अय्यूब की देखादेखी ही यूसुफ ने कुरआन में गहन दिलचस्पी दिखाई और अँगरेजी साहित्य को भी खंगाल मारा।

दिलीप कुमार की फिल्म ‘शहीद’ उन्होंने परिवार के साथ बैठकर देखी थी और फिल्म उन्हें पसंद आई थी। फिल्म का अंत देखकर उनकी आँखों में आँसू आ गए थे और उन्होंने यूसुफ से कहा था कि आगे से अंत में मौत देने वाली फिल्में मत करना। इत्तफाक देखिए कि दिलीप कुमार ने ‍फिल्मों में ‍जितने मृत्यु दृश्य किए हैं, उतने किसी अन्य भारतीय अभिनेता ने नहीं दिए। यही नहीं, वे हिन्दी सिनेमा में ‘ट्रेजेडी-किंग’ कहलाए।

दोस्ती अलग : प्यार अलग:-

उनका कहना था कि अपनी बीमार-सी लड़की को शूटिंग के लिए इतनी दूर नहीं भेज सकते। चोपड़ा ने वैजयंतीमाला को साइन कर लिया और मधुबाला के विरुद्ध कोर्ट में मुकदमा कर दिया। इस प्रकरण में न्याय की खातिर दिलीप कुमार चोपड़ा के पक्ष में खड़े रहे। असली अदावत तो दो पठानों के बीच थी। अताउल्लाह और यूसुफ के बीच। अज्ञात मराठी लड़की से लेकर मधुबाला तक तीनों प्रेम प्रकरणों में दिलीप कुमार ने निष्फल प्रेमी की अपनी फिल्मी छवि को साकार रूप दिया। दिलीप कुमार के जीवन में इस तरह के नाटकीय मोड़ आगे भी आते रहे

जगन्नाथ बैरागी
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