पुरी (ओडिशा)। भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा सनातन धर्म की सबसे भव्य और दिव्य परंपराओं में से एक है। ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर को हिंदू धर्म के चार पवित्र धामों में विशेष स्थान प्राप्त है। यहां भगवान श्रीकृष्ण, भगवान जगन्नाथ के स्वरूप में अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली यह रथ यात्रा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र होती है। देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लाखों श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा के साक्षी बनने पुरी पहुंचते हैं।

स्नान पूर्णिमा से होती है रथ यात्रा की शुरुआत
रथ यात्रा की तैयारियां ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन आयोजित होने वाले स्नान पूर्णिमा महोत्सव से प्रारंभ होती हैं। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों के जल से भव्य अभिषेक किया जाता है। इस अनुष्ठान को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं।
स्नान के बाद भगवान हो जाते हैं अस्वस्थ, शुरू होता है ‘अनसर काल’
धार्मिक मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ को ज्वर हो जाता है। इसके बाद वे लगभग पंद्रह दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को ‘अनसर काल’ कहा जाता है। इस दौरान श्रीमंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भगवान को औषधीय भोग अर्पित कर विशेष उपचार किया जाता है। भक्त इस अवधि में भगवान के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं।
नवयौवन दर्शन के बाद निकलती है विश्वविख्यात रथ यात्रा
अनसर काल समाप्त होने के बाद भगवान के नवयौवन स्वरूप के दर्शन कराए जाते हैं। इसके पश्चात भव्य रथ यात्रा प्रारंभ होती है। भगवान जगन्नाथ अपने विशाल नंदीघोष रथ, बलभद्र तालध्वज रथ और देवी सुभद्रा दर्पदलन रथ पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक प्रस्थान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार गुंडिचा देवी भगवान की मौसी हैं और भगवान नौ दिनों तक उनके यहां निवास करते हैं।
लाखों श्रद्धालु खींचते हैं भगवान के रथ की रस्सी
रथ यात्रा का सबसे भावुक और अद्भुत दृश्य तब देखने को मिलता है, जब लाखों श्रद्धालु भगवान के रथ की रस्सियों को खींचने के लिए उमड़ पड़ते हैं। पूरा पुरी शहर “जय जगन्नाथ” के जयघोष से गूंज उठता है। भक्तों का विश्वास है कि भगवान के रथ की रस्सी खींचना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
रथ की डोर पकड़ने से मिलता है अपार पुण्य
शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में श्रद्धापूर्वक शामिल होने तथा रथ की रस्सी खींचने से व्यक्ति के अनजाने में हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। ऐसा करने वाले भक्तों पर भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा बनी रहती है और उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
भगवान स्वयं आते हैं अपने भक्तों के द्वार
रथ यात्रा का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश यह है कि भगवान केवल मंदिरों में ही सीमित नहीं रहते, बल्कि वे स्वयं अपने भक्तों के बीच आकर उन्हें दर्शन देते हैं। यह यात्रा भगवान और भक्त के बीच अटूट प्रेम, समानता और समर्पण का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है।
सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है रथ यात्रा
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष यह दिव्य आयोजन करोड़ों श्रद्धालुओं के मन में नई आस्था, नई ऊर्जा और भगवान के प्रति अटूट विश्वास का संचार करता है। पुरी की पावन धरती पर निकलने वाली यह भव्य रथ यात्रा संपूर्ण विश्व को प्रेम, सेवा, भाईचारे और मानव कल्याण का संदेश देती है।
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