सारंगढ़। जिले में सिजेरियन प्रसव (LSCS) की बढ़ती दर और इसके बावजूद मातृ मृत्यु दर में कमी नहीं आने का चिंताजनक तथ्य सामने आया है। पूर्व मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. एफ.आर. निराला द्वारा किए गए प्रसव विश्लेषण में खुलासा हुआ है कि जिले में सिजेरियन प्रसव की दर 30 प्रतिशत से अधिक पहुंच गई है, जो प्रदेश और राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है। इसके बावजूद मातृ मृत्यु दर 186 प्रति लाख दर्ज की गई, जबकि प्रदेश की औसत मातृ मृत्यु दर 146 प्रति लाख है। वर्ष भर में जिले में 18 मातृ मृत्यु के मामले सामने आए, जिसने स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

37 प्रतिशत महिलाएं प्रसव के लिए जिले से बाहर जाने को मजबूर

विश्लेषण के अनुसार गत वर्ष जिले में कुल 10,611 गर्भवती महिलाओं का पंजीयन हुआ। इनमें से केवल 4,365 प्रसव (52 प्रतिशत) सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में हुए, जबकि 1,170 प्रसव (11 प्रतिशत) निजी अस्पतालों में संपन्न हुए। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 3,941 महिलाएं (37 प्रतिशत) प्रसव के लिए जिले से बाहर के अस्पतालों में गईं।
सारंगढ़ ब्लॉक से सर्वाधिक 1,775 महिलाओं का प्रसव जिले के बाहर हुआ, जो स्थानीय स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को दर्शाता है।
बरमकेला में सबसे अधिक सिजेरियन प्रसव
ब्लॉकवार आंकड़ों में बरमकेला में सिजेरियन प्रसव की दर सबसे अधिक 36 प्रतिशत दर्ज की गई। बिलाईगढ़ में यह दर 30 प्रतिशत और सारंगढ़ में 28 प्रतिशत रही। पूरे जिले में कुल 2,852 प्रसव ऑपरेशन के माध्यम से कराए गए।
विशेषज्ञों का मानना है कि सिजेरियन प्रसव का उद्देश्य जटिल परिस्थितियों में मां और शिशु दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है, लेकिन जिले में बढ़ते ऑपरेशन के बावजूद मातृ मृत्यु दर का ऊंचा बने रहना चिंता का विषय है।
ऑपरेशन के बाद भी क्यों नहीं बच पाईं माताएं?
डॉ. निराला के अनुसार अधिकांश मामलों में शिशु तो सुरक्षित रहे, लेकिन मां की जान नहीं बचाई जा सकी। मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (पोस्ट पार्टम हेमरेज), उच्च रक्तचाप, गंभीर एनीमिया तथा प्रसव उपरांत संक्रमण शामिल रहे।
उन्होंने बताया कि इन कारणों में से अधिकांश को समय रहते पहचान और उचित उपचार से रोका जा सकता है।
तीन तरह की देरी बन रही मौत की वजह
अध्ययन में यह भी सामने आया कि मातृ मृत्यु के पीछे तीन प्रमुख प्रकार की देरी जिम्मेदार हैं—
निर्णय लेने में देरी: परिवार द्वारा समय पर अस्पताल जाने का निर्णय नहीं लेना।
परिवहन में देरी: मरीज को समय पर उच्च स्वास्थ्य संस्थान तक नहीं पहुंचा पाना।
इलाज में देरी: अस्पताल पहुंचने के बाद उपचार शुरू होने में विलंब।
इन तीनों कारणों के चलते गंभीर स्थिति वाली गर्भवती महिलाओं की जान बचाना मुश्किल हो जाता है।
क्या है समाधान?
डॉ. निराला ने मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। उन्होंने कहा कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में शत-प्रतिशत पंजीयन सुनिश्चित किया जाए तथा प्रत्येक गर्भवती महिला की कम से कम चार गुणवत्तापूर्ण एएनसी (ANC) जांच अनिवार्य रूप से हो।
इसके अलावा उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की समय पर पहचान, संभावित प्रसव तिथि (EDD) से पहले ही उन्हें उच्च स्वास्थ्य संस्थानों में भर्ती करना तथा बार-बार रेफरल की व्यवस्था को समाप्त करना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि उच्च रक्तचाप और एनीमिया मातृ मृत्यु के दो ऐसे बड़े कारण हैं जिन्हें प्रभावी निगरानी और उपचार से रोका जा सकता है। समय पर रक्तचाप नियंत्रण से एक्लेम्पसिया जैसी गंभीर स्थिति से बचाव संभव है, वहीं आयरन-फोलिक एसिड (IFA) की नियमित खुराक से रक्तस्राव से होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है।
हर मातृ मृत्यु की हो डेथ ऑडिट
डॉ. निराला ने जोर देकर कहा कि प्रत्येक मातृ मृत्यु और अधिक मृत्यु वाले अस्पतालों की डेथ ऑडिट
अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों की पहचान होगी और सुधारात्मक कदम उठाए जा सकेंगे।
उन्होंने कहा कि केवल सिजेरियन प्रसव की संख्या बढ़ाने से मातृ मृत्यु दर कम नहीं होगी। इसके लिए स्वास्थ्य तंत्र, रेफरल व्यवस्था, समय पर उपचार और गर्भवती महिलाओं की नियमित निगरानी को मजबूत करना होगा। योजनाबद्ध और जवाबदेह कार्यप्रणाली से ही जिले में मातृ मृत्यु दर को कम किया जा सकता है।

