संजय भूषण पांडेय ने जगन्नाथ पुरी से लौटते ही ‘कर्म’ को बनाया ‘तीर्थ’…अमलीपाली में पेश की राजनीति में समर्पण की नई मिसाल..
सारंगढ़-बिलाईगढ़:
कहते हैं कि तीर्थ यात्रा से लौटने के बाद इंसान सुकून और विश्राम खोजता है, लेकिन सारंगढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष संजय भूषण पांडेय की मिट्टी और मन दोनों अलग हैं। जगन्नाथ पुरी धाम की पावन यात्रा से लौटने के बाद, अपनों के बीच घर जाने के बजाय, उन्होंने कर्तव्य की राह चुनी। वे सीधे जिले के अंतिम छोर पर बसे गांव अमलीपाली पहुंचे, ताकि ‘गांव-घर चलो’ अभियान के जरिए विकास की अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति से मिल सकें।
‘सेवक’ का दायित्व निभाते संजय –
संजय भूषण पांडेय का यह कदम केवल एक राजनीतिक दौरा नहीं, बल्कि उनकी गहरी संवेदनशीलता का परिचायक है। आज के दौर में जहां जनप्रतिनिधि प्रोटोकॉल और सुविधाओं में घिरे रहते हैं, वहीं संजय भूषण ने चिलचिलाती धूप और धूल भरे निर्माण स्थलों के बीच खड़े होकर यह साबित कर दिया कि उनके लिए “जन सेवा ही सबसे बड़ा धर्म” है।
उनकी सादगी और सक्रियता की चर्चा पूरे जिले में है। जगन्नाथ स्वामी का आशीर्वाद लेकर लौटे अध्यक्ष ने जिस तरह से सीधे जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुना और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच की, वह यह दर्शाता है कि उनकी प्राथमिकता में केवल कुर्सी नहीं, बल्कि सारंगढ़ का विकास और जनता का विश्वास है।
निर्माण कार्यों पर पैनी नजर-
निरीक्षण के दौरान संजय भूषण पांडेय का कड़ा तेवर भी देखने को मिला। उन्होंने निर्माणाधीन कार्यों के पास खड़े होकर बारीकी से गुणवत्ता की जांच की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा:
”निर्माण कार्यों में लापरवाही जनता के हक पर डाका डालने जैसा है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। काम में पारदर्शिता और मजबूती ही हमारी पहचान होनी चाहिए।”
जनता का उमड़ा प्यार-
अमलीपाली के ग्रामीणों के लिए यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था कि उनका नेता इतनी दूरस्थ सीमा पर उनसे मिलने पहुंचा है। ग्रामीणों ने भावुक होकर कहा कि जब कोई जनप्रतिनिधि अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधा और थकान को त्यागकर सीधे जनता के बीच आता है, तो शासन पर भरोसा और बढ़ जाता है।
कर्मयोगी की नई परिभाषा-
संजय भूषण पांडेय ने यह सिद्ध कर दिया है कि मंदिर के दर्शन मात्र से यात्रा पूरी नहीं होती, बल्कि जब उस मंदिर की सीख को जनता के आंसू पोंछने और विकास कार्यों को गति देने में लगाया जाए, तभी वह यात्रा सफल मानी जाती है। सारंगढ़ की जनता को आज संजय भूषण के रूप में एक ऐसा ‘कर्मयोगी’ मिला है, जिसके लिए जनता का आंगन ही उसका सबसे बड़ा मंदिर है।

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