सारंगढ़। कहते हैं कि ‘योजना’ उसे कहते हैं जिसमें भविष्य की तैयारी हो, लेकिन हमारे नवगठित जिले सारंगढ़-बिलाईगढ़ में ‘योजना’ का मतलब शायद कुछ और ही है। यहाँ करोड़ों की लागत से चमचमाती तीन फायर ब्रिगेड गाड़ियाँ तो खरीद ली गईं, लेकिन शायद साहब लोग यह फाइल में लिखना भूल गए कि इन भारी-भरकम मशीनों को खड़ा करने के लिए ‘जमीन’ की भी जरूरत होती है। नतीजा यह है कि पिछले 15 महीनों से जिले की सुरक्षा रायगढ़ के भरोसे ‘हवा’ खा रही है।

करोड़ों की गाड़ियाँ, कबाड़ होने की तैयारी-

जनवरी 2025 में बड़े ताम-झाम के साथ तीन अत्याधुनिक अग्निशमन वाहनों की खरीदी की गई थी। मकसद था कि सारंगढ़ में जब भी कहीं आग लगे, तो ये गाड़ियाँ फौरन पहुँचे। लेकिन विडंबना देखिए, 15 महीने बीत जाने के बाद भी तीन में से दो गाड़ियाँ आज भी रायगढ़ के फायर स्टेशन यार्ड में धूल फांक रही हैं। प्रशासन का तर्क इतना ‘मासूम’ है कि सुनकर हंसी आ जाए— “हमारे पास इन्हें रखने की जगह नहीं है!”
सोचने वाली बात यह है कि जिस जिले के गठन के लिए करोड़ों का बजट आता है, क्या वहां दो गाड़ियाँ खड़ी करने के लिए चंद फिट जमीन का इंतजाम 15 महीनों में भी नहीं हो पाया?
डीजल टैंक में ईंधन नहीं, ‘प्रशासनिक सुस्ती’ की हवा भरी है-
रायगढ़ से आ रही खबरें और भी चौंकाने वाली हैं। बताया जा रहा है कि लंबे समय से खड़े रहने और रखरखाव के अभाव में इन वाहनों के डीजल टैंक में अब ‘एयर’ (हवा) भर चुकी है। यानी जो गाड़ियाँ आग बुझाने के काम आनी थीं, वे अब खुद अपनी सांसें बहाल होने का इंतजार कर रही हैं। बिना चले ही ये गाड़ियाँ धीरे-धीरे कबाड़ में तब्दील हो रही हैं, जो सीधे तौर पर जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी है।
पड़ोसी के भरोसे ‘अग्नि सुरक्षा’
सारंगढ़ में आए दिन आगजनी की छोटी-बड़ी घटनाएँ होती रहती हैं। जब शहर में आग लगती है, तो जनता त्राहि-त्राहि करती है, और प्रशासन शायद यह सोचकर संतोष कर लेता है कि हमारी गाड़ियाँ रायगढ़ में सुरक्षित हैं! एक गाड़ी नगर पालिका को देकर जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली गई है, जबकि बाकी दो को वापस लाने की इच्छाशक्ति फाइलों के नीचे दबी नजर आती है।
जिम्मेदारी किसकी?
तत्कालीन कलेक्टर्स और अधिकारियों ने महाराष्ट्र पासिंग की इन गाड़ियों को आनन-फानन में खरीद तो लिया, लेकिन क्या उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि इन्हें रखने का ठिकाना कहाँ होगा? क्या प्रशासन यह इंतजार कर रहा है कि कोई बड़ी अनहोनी हो, तब जाकर नींद खुलेगी?
सारंगढ़-बिलाईगढ़ की जनता अब सवाल पूछ रही है— क्या हमें हमारी गाड़ियाँ तभी मिलेंगी जब प्रशासन को ‘जमीन’ मिल जाएगी, या फिर ये गाड़ियाँ रायगढ़ में ही ‘रिटायर’ होकर वापस आएंगी? फिलहाल तो स्थिति यही है कि “गाड़ी अपनी, सुरक्षा पराई, और जगह की कमी ने आफत मचाई!”
यह लेख का उद्देश्य जनहित में व्यवस्था की कमियों को उजागर करना है।
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