सारंगढ़: कहते हैं अस्पताल वह जगह है जहाँ इंसान अपनी बीमारियाँ छोड़कर आता है। लेकिन सारंगढ़ जिला अस्पताल ने इस कहावत को नए सिरे से परिभाषित करने का बीड़ा उठाया लगता है। यहाँ प्रशासन की ‘असीम अनुकंपा’ से मरीजों को इलाज के साथ-साथ नई-नई बीमारियाँ ‘बाय वन गेट वन फ्री’ (एक के साथ एक मुफ्त) की तर्ज पर मिलने का पुख्ता इंतज़ाम नज़र आ रहा है।

RTI और कानून की नज़र में-

विधि विशेषज्ञों के अनुसार, किसी सार्वजनिक अस्पताल में, विशेषकर जहाँ पीने के पानी की व्यवस्था हो, वहाँ इस तरह की घातक गंदगी पाया जाना सीधे तौर पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं (जो लोक स्वास्थ्य और सुरक्षा से खिलवाड़ से संबंधित हैं) के तहत गंभीर लापरवाही का मामला बनता है। यह नागरिकों के जीवन के अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 21) का भी उल्लंघन है।
वाटर कूलर या ‘छिपकली सूप’ का पतीला?
मामला तब खुला जब एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष अभिषेक शर्मा प्यास बुझाने अस्पताल के वाटर कूलर के पास पहुंचे। उन्होंने जैसे ही कूलर के अंदर झांका, उनकी प्यास तो तुरंत काफूर हो गई, लेकिन हैरत का ठिकाना न रहा। कूलर के ठंडे पानी में एक ‘मरी हुई छिपकली’ बड़े आराम से तैरती (या कहें कि ‘इन्फ्यूज’ होती) पाई गई। शायद अस्पताल प्रबंधन मरीजों के पानी में ‘प्रोटीन’ की एक्स्ट्रा डोज़ देने की कोई गुप्त योजना चला रहा था, जिसका उद्घाटन गलती से समय से पहले हो गया।
पीलिया कम था, जो अब ‘लिज़र्ड थेरेपी’ शुरू कर दी?
विदित हो कि सारंगढ़ शहर पहले ही दूषित पानी की बदौलत पीलिया (Jaundice) के प्रकोप से कराह रहा है। ऐसे में जिला अस्पताल ने सोचा होगा कि सादे पीलिया से क्या होगा, चलो मरीजों को कुछ ‘रोमांचक’ परोसा जाए। एक संवेदनशील स्थान पर, जहाँ सफाई ‘सर्वोपरि’ होनी चाहिए, वहाँ पानी में छिपकली का मिलना स्वास्थ्य विभाग की कुंभकर्णी नींद और उसकी कार्यप्रणाली पर गहरा, लेकिन ‘कानूनी रूप से सुरक्षित’ तंज कसता है।
दावे हवा-हवाई, हकीकत पानी में तैरती हुई!
सरकार की ‘स्वच्छ जल’ और ‘स्वच्छ कल’ जैसी तमाम योजनाएं जिला अस्पताल के इस वाटर कूलर में आकर ‘जलसमाधि’ लेती प्रतीत होती हैं। जहाँ मरीज जीवन की आस लेकर आते हैं, वहाँ उन्हें साफ़ पानी तक नसीब नहीं है। यह घटना महज़ एक लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की उस ‘सड़ांध’ का प्रतीक है, जिसे परदे के पीछे छिपाने की लाख कोशिशें की जाती हैं, लेकिन वो छिपकली की तरह तैरकर ऊपर आ ही जाती है।
अब क्या करेगा प्रशासन?
सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही है। क्या इस ‘विशिष्ट’ प्रोटीन-युक्त पानी पिलाने के जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई होगी? या फिर हमेशा की तरह एक ‘जांच समिति’ गठित कर दी जाएगी, जो तब तक जांच करेगी जब तक कि जनता इस घटना को भूल न जाए या कोई और बड़ी ‘छिपकली’ किसी दूसरे विभाग से न निकल आए?
फिलहाल, अस्पताल प्रशासन की इस ‘अनूठी’ व्यवस्था ने पूरे शहर में दहशत और चिंता का माहौल बना दिया है। लोग अब अस्पताल जाने से पहले दो बार सोच रहे हैं—कहीं इलाज कराने के चक्कर में वे ‘परलोक’ का टिकट न कटा लें।

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