सारंगढ़-बिलाईगढ़: प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी ‘जल जीवन मिशन’ योजना सारंगढ़ के ग्राम पंचायत परसदा (बड़े) में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। आरोप है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के अधिकारियों और ठेकेदारों की जुगलबंदी ने लगभग 1 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना को कागजों पर तो ‘पूर्ण’ कर दिया, लेकिन धरातल पर आज भी ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।

सरकारी खजाने पर डाका?
परियोजना के दस्तावेजों के विश्लेषण से एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। नियमतः किसी भी परियोजना का भुगतान भौतिक सत्यापन (Physical Verification) और माप पुस्तिका (Measurement Book) में प्रविष्टि के बाद ही होना चाहिए। किन्तु, परसदा (बड़े) में निर्धारित मानकों को ताक पर रखकर 90% भुगतान पहले ही आहरित कर लिया गया। आश्चर्यजनक पहलू यह है कि योजना को दो वर्ष पूर्व ही ‘हैंडओवर’ दिखा दिया गया, जबकि आज भी वितरण प्रणाली ठप पड़ी है।
RTI में हुआ बड़ा खुलासा-
सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त दस्तावेजों ने भ्रष्टाचार की पोल खोल दी है
अभिलेखों में 350 प्लेटफॉर्म (चबूतरा) का निर्माण दर्शाया गया है, लेकिन मौके पर न तो इनकी संख्या सही है और न ही इनका आकार तकनीकी प्राक्कलन (Estimate) के अनुरूप।
पाइपलाइन को निर्धारित गहराई में बिछाने के बजाय सतह के पास छोड़ दिया गया। साथ ही, कागजों में पाइपलाइन की लंबाई वास्तविक दूरी से 3 से 5 मीटर अधिक दिखाकर सरकारी राशि का गबन किए जाने का गंभीर आरोप है।
यह स्पष्ट रूप से माप पुस्तिका और लेखांकन में कूट-रचना की ओर संकेत करता है, जो भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
जांच पर सवाल-
प्रकरण का सबसे विवादास्पद पहलू इसकी जांच प्रक्रिया है। शिकायत के बाद निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने के बजाय, विभाग ने उन्हीं अधिकारियों को जांच सौंप दी जो स्वयं संदेह के घेरे में हैं। “अपराधी ही न्यायाधीश” वाली इस कार्यप्रणाली ने प्रशासन की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

न्यायिक शरण में जाने की चेतावनी-
शिकायतकर्ता ने अब जिला कलेक्टर के समक्ष पुनः अभ्यावेदन प्रस्तुत कर स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट की मांग की है। चेतावनी दी गई है कि यदि शासन के इस महत्वाकांक्षी मिशन में हुए वित्तीय अनुशासनहीनता पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो प्रकरण को माननीय उच्च न्यायालय (High Court) के समक्ष जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से ले जाया जाएगा।
निष्कर्ष: यह मामला केवल एक ग्राम पंचायत की अनियमितता नहीं है, बल्कि शासन की छवि धूमिल करने और सार्वजनिक धन के सुनियोजित दुरुपयोग का एक बड़ा उदाहरण है। अब देखना यह है कि प्रशासन दोषियों पर शिकंजा कसता है या फाइलों को दबाने का खेल जारी रहता है।

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