सेवा ही सच्चा धर्म: माता-पिता से लेकर राष्ट्र तक निभाएं कर्तव्य…
सारंगढ़। राष्ट्र सेवा हो, माता-पिता की सेवा या फिर मानव और जीव-जंतुओं की सेवा—हर रूप में सेवा करने से न केवल धर्म की प्राप्ति होती है, बल्कि व्यक्ति को आत्मिक संतुष्टि और जीवन की सच्ची सफलता भी मिलती है। ये प्रेरणादायक विचार यादव समाज के अध्यक्ष जगजीत यादव ने व्यक्त किए।
हर नागरिक का है राष्ट्र सेवा में योगदान
उन्होंने कहा कि देश सेवा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह किसी न किसी रूप में अपनी मातृभूमि, जन्मभूमि और कर्मभूमि की सेवा करे। समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना ही सच्ची देशभक्ति है।
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म
जगजीत यादव ने माता-पिता की सेवा को सर्वोच्च स्थान देते हुए कहा कि जिन्होंने अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए कठिनाइयों भरा जीवन जिया, उनकी सेवा करना हर संतान का पहला कर्तव्य है। जो व्यक्ति इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ता है, वह मानवता के मूल्यों से दूर हो जाता है।
बचपन से दें सेवा संस्कार
उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों में सेवा की भावना बाल्यकाल से ही विकसित की जानी चाहिए, जो माता-पिता और शिक्षकों की जिम्मेदारी है। यही संस्कार आगे चलकर समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं।
सेवा भारती की सराहनीय पहल
इस दौरान सेवा भारती द्वारा समाज के जरूरतमंद वर्गों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और भोजन जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने की भी सराहना की गई। खास बात यह है कि यह सेवा निजी संसाधनों से की जा रही है, जो समाज के प्रति समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
उन्होंने अंत में कहा कि निःस्वार्थ सेवा ही जीवन को सार्थक बनाती है और यही सच्चे धर्म का मार्ग है।
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