मदरसे के नाम पर सरकार को करोड़ों रुपये का चूना: ना टीचर, ना छात्र बस जेब भरने का काम….
मध्य प्रदेश में मदरसे के नाम पर सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगाने का काम चल रहा है. शहडोल में मान्यता प्राप्त एक मदरसे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता गुलामदीन ने ऐसा खुलासा किया गया, जिसने शिक्षा व्यवस्था को लेकर किए जा रहे तमाम दावों की पोल खोल कर रख दी.
जिले में लगातार मदरसा को लेकर शिकायतें आ रही थीं, लेकिन प्रशासन ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया. जिले की खैरहा पंचायत में एक ऐसा मदरसा है, जहां ना ही बच्चे पढ़ते हैं और ना ही शिक्षक है सिर्फ और सिर्फ बच्चों के फर्जी एडमिशन दिखाकर शासन को करोड़ों का चूना लगाया जा रहा है.
सरकारी दावे के मुताबिक, मदरसा हमीदिया शमशुल उलूम में 1 से लेकर 8 तक के बच्चे पढ़ते हैं. मदरसे के संचालक हेडमास्टर समसुद्दीन है. यह मदरसा 2002 से चल रहा है. सरकार की ओर से मदरसे को बच्चों को छात्रवृत्ति, भवन मेंटेनेंस, शिक्षकों को मानदेय और मध्यान भोजन के लिए अनुदान मिलता है. यही नहीं समय-समय पर अधिकारियों की ओर से मदरसे का समय-समय पर निरीक्षण भी होता है और हर बार फर्जी रिपोर्ट के आधार पर मदरसे को तमाम तरह की सुविधाएं सरकार द्वारा दी जाती रही. मदरसे को हर साल राज्य सरकार की ओर से 4 लाख और भारत सरकार की ओर से 35 लाख रुपए मिलते हैं.
कैसे हुआ खुलासा
इस बड़े फर्जीवाड़े के खुलासा तब हुआ जब मोहम्मद सिद्दीक अपने 5 साल के बच्चे रेहान का एडमिशन सरकार स्कूल में कराने पहुंचे. स्कूल की ओर से एडमिशन के लिए समग्र आईडी मांगी गई. समग्र आईडी से मोहम्मद सिद्दीक का बेटा मोहम्मद रेहान पहले से ही खैरहा स्थित हमीदिया शमशुल उलूम मदरसे की 6वीं क्लास में पड़ रहा है. यह जानकर मोहम्मद सिद्दीक हैरान रह गए, क्योंकि वे तो पहली बार किसी स्कूल में अपने बेटे का एडमिशन करा रहे थे.
मदरसे का मालिक भी फर्जी स्टूडेंट
मजे की बात तो है कि मदरसे का मालिक समसुद्दीन अभी भी इस मदरसे में पढ़ रहा था. उसने अपना भी एडमिशन सरकारी कागजों में कर रखा था. सवाल यह उठता है कि प्रशासन ऐसे अवैध मदरसों पर कार्रवाई क्यों नहीं करता, जो शासन की योजनाओं का लाभ भी ले रहे हैं और अधिकारी कर्मचारी उनका साथ दे रहे हैं. जब ऐसे खुलासे हो जाते हैं तो लगातार पीड़ित पक्ष को न्याय के लिए भटकना पड़ता है.
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