अजीबोगरीब छत्तीसगढ़: एक ऐसा गाँव जहाँ सभी बराती बन गये पत्थर! एक ऐसा गाँव जहाँ हर शादी से पहले पत्थर के दूल्हा और दुल्हन की होती है पूजा…
छ्त्तीसगढ़ के कोरबा जिले में बरपाली के पास कोरबा-चांपा मार्ग पर डोंगरीभाठा गांव है. यहां पिछले 100 साल से एक अजीबोगरीब और अनोखी परंपरा निभाई जा रही है. यहां गांव की हर शादी से पहले पत्थर के दूल्हा और दुल्हन की पूजा होती है.
गांव में जब बेटी की शादी होती है, तब सूरज निकलने से पहले ही उसे विदा कर दिया जाता है.
डोंगरीभाठा गांव में जब बाराती बन गए पत्थर
कोरबा: गांव के प्रारंभ में ही एक स्थान है, जहां कतार से पत्थरों की मौजूदगी है. इन्हें दूल्हा-दुल्हन के तौर पर पूजा जाता है. यहां मौजूद मुख्य पत्थरों को दूल्हा-दुल्हन और बाकी पत्थरों को बाराती की संज्ञा दी गई है.मान्यता है कि यह पत्थर कभी चलते-फिरते मानव थे. दूल्हा दुल्हन सहित पूरी बारात यहां से गुजर रही थी. एक अच्छा स्थान देखकर रात्रि विश्राम के लिए अपना ठहराव बनाया. रात को सभी ने यहां भोजन भी किया. लेकिन जैसे ही सुबह हुई, सूर्य की पहली किरण पढ़ते ही वह सभी पत्थर के बन गए. गांव में मान्यता है कि एक गलती की वजह से वह सभी पत्थर में तब्दील हो गए.
कभी आदमी हुआ करते थे सभी पत्थर:
स्थानीय ग्रामीण श्याम बाई कहती है कि “यह सभी पत्थर कभी आदमी हुआ करते थे. रात में ही वह रवाना नहीं हुए, सुबह सूरज की पहली किरण उन पर पड़ी और वह पत्थर के बन गये. गांव की हर शादी से पहले पत्थरों की पूजा की जाती है. बारात किसी की भी हो, वहां से होकर गुजरने पर नारियल चढ़ाये बिना आगे नहीं बढ़ती. फिर से कोई पत्थर का ना बन जाये इसलिए बेटी की विदाई भी दिन होने के पहले ही की जाती है”.
100 साल से चली आ रही परंपरा,
पत्थरों की ऊंचाई भी बढ़ रही :
गांव के बैगा(पुजारी) 70 वर्षीय टिकैत राम कहते हैं कि जब से होश संभाला है, तब से गांव में इस तरह की परंपरा चली आ रही है. हर शादी की पूजा यहीं से शुरू होती है. गांव वाले इस बात का खासतौर पर ध्यान रखते हैं कि सुबह होने से पहले ही बेटी को विदा कर दिया जाए. पुरानी मान्यताओं को लोग मानते हैं, नए को नहीं मानते. इन पत्थरों की ऊंचाई भी हर साल बढ़ जाती है. अभी आप पत्थरों पर सिंदूर का टीका लगा दीजिए और अगले साल फिर आकर देखिए. सिंदूर के निशान से ऊंचाई कुछ बढ़ी हुई दिखेगी”.
गांव वालों ने नहीं तोड़ी परंपरा :
बारातियों के पत्थर बन जाने वाली मान्यता पर विश्वास करना कठिन है. अब इसके पीछे का सच क्या है और इस रहस्यमयी कहानी की शुरुआत कहां से हुई. यह किसी को नहीं पता. लेकिन वर्तमान परिवेश में गांव में इस कहानी को लोग सच मानते हैं. वह बेटी को दिन में विदा कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते.
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