रायगढ़। टिमरलगा और गुड़ेली के कुछ क्रशर संचालक खनिज विभाग की सरपरस्ती में नियम-कायदों से ऊपर हो गए हैं। इतने सालों में कभी किसी खनिज अधिकारी ने खनिपट्टों की जांच करने का साहस ही नहीं किया। दरअसल जेब पर डाले जाने वाले बोझ के कारण खनिज अधिकारी कुर्सी में बैठे-बैठे ही सबकी जांच करते रहे और रॉयल्टी बांटते रहे।
रेवड़ी की तरह बंटने वाली रॉयल्टी पर्ची के कुछ नियम हैं। चूना पत्थर और डोलोमाइट के खनिपट्टों को सालाना एक लिमिट में ही उत्पादन और बिक्री की अनुमति है। हर साल इस सीमा में ही रॉयल्टी पर्ची जारी की जानी है। खनिज विभाग को वर्ष में दो बार असेसमेंट करना होता है। किसी भी खनिज अधिकारी या निरीक्षक ने असेसमेंट के अलावा एक बार भी खनिपट्टों की मौका जांच नहीं किया। मतलब किसी ने देखने की जहमत नहीं उठाई कि खदानों से कितना खनिज खोदा गया, कितना बेचा गया।
इसे रॉयल्टी पर्ची से मिलान कर जांच की जानी थी। एक भी खनिपट्टों की जांच खनिज विभाग ने नहीं की। असेसमेंट के समय केवल कागज और उस पर रखा जाने वाला वजन देखा गया। सौ से ज्यादा क्रशरों से खनन और उत्पादन का आंकड़ा बहुत बड़े घपले का संकेत दे रहा है। क्रशर संचालक अपनी उत्पादन क्षमता के हिसाब से विभाग से रॉयल्टी जारी करवाते हैं। इसके बाद पर्ची के जरिए डिस्पैच होता है। खदान से उत्पादन भी उतना ही होता है, यह किसी को बताया नहीं जाता। कई क्रशर ऐसे हैं जिन्होंने बमुश्किल दस-बीच हजार टन खोदा होगा लेकिन एक लाख टन से अधिक की रॉयल्टी जारी हो चुकी है।

बिना खनन के मिलती है रॉयल्टी

कई पट्टेदारों को चूना पत्थर में बिना लागत के मुनाफा कमाने का चस्का लगा है। वे अपने पट्टे पर एक पत्थर नहीं निकालते हैं। अवैध खनन से जो पत्थर मिलते हैं, उसे अपना बताकर खनिज विभाग से रॉयल्टी जारी करवाते हैं। इस रॉयल्टी में से कुछ का उपयोग करके बाकी को दूसरे क्रशरों में बेच दिया जाता है। बिना उत्पादन के मुनाफा होता है।
असेसमेंट तो जो स्टॉक बताया वही सही
खनिज विभाग में बहुत अजीब परिपाटी बन गई है। छह महीने में होने वाले असेसमेंट के दौरान ओपनिंग और क्लोजिंग स्टॉक बताया जाता है। इस बीच में उपयोग किए गए रॉयल्टी की जानकारी बताई जाती है। बचत स्टॉक का वेरीफिकेशन भी नहीं कराया जाता। खनिज अधिकारी भी मौके पर जाकर खनन और स्टॉक की जांच नहीं करता। पूर्व खनिज उप संचालक और उनके मातहतों ने काम का पूरा तरीका ही बिगाड़ दिया है।
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