महिला समूहों ने 2 माह में बेचे 14 लाख के ट्री गार्ड, 7 लाख का हुआ शुद्ध मुनाफा…मिली तरक्की की नई राह…
जगन्नाथ बैरागी
रायगढ़, कोरोना महामारी कई लोगों की आजीविका में बाधा बन कर सामने आया। लेकिन बिहान योजना से जुड़ कर और प्रदान संस्था के मार्गदर्शन से चुनौतियों का सामना कर बाधाओं से अवसर प्रदान करने का मौका कोसमनारा गांव के बांस उत्पाद निर्माताओं को मिला।
कोसमनारा रायगढ़ शहर के पास एक छोटा सा गांव है, इस गांव के ज्यादातर लोग तुरी समुदाय के हैं। इस समुदाय के लोगों का मुख्य व्यवसाय बांस के उत्पाद बनाना है। पिछले साल कोविड से बचाव के लिए लंबे समय से लॉकडाउन में काम में हुए नुकसान के कारण गांवों में लोग परेशान थे। इस दौरान सरकार और जिला प्रशासन ने स्व सहायता समूह की महिलाओं के साथ-साथ अन्य लोगों को उनकी क्षमता और विशेषज्ञता के अनुसार कार्य उपलब्ध करवाने की दिशा काम किया गया ताकि उनके आय में बढ़ोतरी की जा सकें।
मनरेगा और गोठान से संबंधित कार्य मुख्य प्राथमिकता पर थे, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सके। गोठान में वृक्षारोपण भी प्रमुख क्षेत्रों में से एक था और इन बागानों की रक्षा के लिए ट्री गार्ड की आवश्यकता थी। चूंकि पौधरोपण बड़े पैमाने पर हो रहा था, इसलिए काफी ट्री गार्ड की भी जरूरत थी। कोसमनारा अपने बांस के उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए इस गांव के लिए यह एक अवसर के रूप में आया। प्रदान संस्था ने बांस उत्पादन करने वाले समूहों को आजीविका योजना के प्रशिक्षण से इस अवसर से अवगत कराया और समूहों की जनपद अधिकारियों के साथ बैठक करने में सहयोग किया। इसके पश्चात अलग-अलग विभागों द्वारा ऑर्डर दिए गए और लोगों ने बांस के ट्री गार्ड बनाने शुरू कर दिए।
इस दौरान पांच स्व-सहायता समूह के 32 सदस्य ट्री गार्ड बनाने में शामिल रहे। प्रशासन ने विभिन्न विभागों के साथ संपर्क करने और अपने उत्पादों को बेचने के लिए उनकी मदद की। इस दौरान एक ट्री गार्ड के उत्पादन की लागत करीब 30 रुपये से 35 रुपये थी जो बिक्री मूल्य का आधा है। इस तरह इस समय उनके द्वारा 14 लाख तक का उत्पादन बिक्री किया गया जिसमें कुल लाभ लगभग 7 लाख है और यह आय दो महीने की समयावधि में है।
एसएचजी सदस्यों के साथ बात करने पर उन्होंने बताया कि उन्हें बाजार में नहीं जाना पड़ा और उत्पादों को उनके दरवाजे पर बेचा जा रहा था और भुगतान भी तुरंत किया गया। पूरे लॉकडाउन अवधि के दौरान उन्हें आय के लिए चिंता करने की जरूरत नहीं थी, वे अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते थे, कुछ परिवारों ने संपत्ति खरीदी जबकि अन्य ने भविष्य के खर्च के लिए रुपये जोड़े । इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि महिला स्व सहायता समूहों का विभिन्न विभागों से लिंकेज हुआ और उन्हें अभी भी रायगढ़ जिले के विभिन्न ब्लॉकों से मांग आ रही है जिससे उन्हें आय का स्थायी स्रोत मिल गया है।
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