शासन की योजनाओं एवं नवीन तकनीकों के प्रयोग से कृषि क्षेत्र में सारंगढ़ के खीरसागर की आय में हुई वृद्धि…पूर्व में कृषि से होता था केवल भरण पोषण, नवाचार से जीवन में आया बदलाव…गोबर और गौमूत्र का जैविक खेती में कर रहे उपयोग, कृषि के साथ पशुपालन एवं उद्यानिकी फसलों से कमाया मिल….

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रायगढ़, विकासखंड सारंगढ़ के ग्राम मानिकपुर निवासी खीरसागर पटेल का जीविकोपार्जन का मुख्य साधन कृषि है। वर्षा आधारित पारम्परिक कृषि से 11 सदस्यों की संयुक्त परिवार का केवल भरण पोषण ही संभव हो पाता था। उन्होंने कृषि में बदलाव तथा वर्षा आश्रय को कम करने के लिए शासन की विभिन्न योजनाओं की जानकारी ली। कृषि विभाग के सहयोग से नलकूप खनन योजनान्तर्गत एक नलकूप का खनन करवाने पश्चात 2.558 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई कर रबी मौसम में भी धान एवं गेहूं की फसल लेने से कुल फसल क्षेत्र दुगुनी होने से उनकी आमदनी में वृद्धि हुई। श्री पटेल द्वारा कृषि क्षेत्र मे नवाचार करते हुए नलकूप से सिंचाई से रकबा विस्तार हेतु कृषि विभाग की ओर से संचालित माइक्रो सिंचाई योजना के तहत उन्होंने स्प्रिंकलर पद्धति सिंचाई से रबी मौसम में कम पानी का उपयोग करते हुए गेहूं, दलहन, तिलहन आदि फसलों का भरपूर उत्पादन प्राप्त किया।
कृषि में बहुफसली को अपनाते हुए पशुुपालन एवं उद्यानिकी फसलों को कृषि में सम्मलित करते हुए डेयरी व सब्जी उत्पादन का कार्य करने लगे। जिससे कृषि से लगभग पौने चार लाख एवं दुग्ध विक्रय कर 60-70 हजार की अतिरिक्त शुद्ध आमदनी प्राप्त की। गोबर को खाद के रूप में अपनाकर कृषिगत फसलों में तिलहन एवं दलहन फसलों को बढ़ावा देते हुए मूंगफली, सरसों, सूरजमुखी, उड़द, मुंग, चना आदि फसलों का परिवर्तन ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर किया। जिससे कम पानी एवं कम लागत में अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हुई। कृषि विभाग से मशीनीकरण योजनान्तर्गत रोटावेटर अनुदान में प्राप्त किया, जिसका उपयोग श्री पटेल रबी फसलों के भूमि तैयारी में करते है। उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़ाते हुए मुख्यत: भिण्डी, करेला, आलू, प्याज, पत्तागोभी आदि सब्जियों को लगाया तथा गांव के समस्त कृषकों की सब्जियों को इक_ा कर सीधे विपणन हेतु बाजार ले जाना प्रारंभ किया। इस प्रकार उद्यानिकी फसलों से उन्होंने कुल 4 लाख 90 हजार रूपए आमदनी प्राप्त की।
पशुपालन से प्राप्त गोबर एवं गौमूत्र के उपयोग को बढ़ाने के लिए अपने गोबर गैस संयंत्र में गोबर का उपयोग ज्यादा करने लगा तथा प्राप्त इंधन को भोजन बनाने में उपयोग किया। बायोगैस स्लरी को कम्पोस्ट के रूप उपयोग करने लगा। गौमूत्र में नीम, करंज, धतूरा आदि पत्तियों को मिलाकर कीटनाशी बनाने का भी कार्य प्रारंभ किया। जिससे कृषि लागत 12 प्रतिशत कम कर अतिरिक्त आय अर्जित किया। उन्होंने स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से घर के छत में जैविक खेती को बढ़ावा देते हुए टमाटर, मिर्च, सेमी, करेला, बैंगन की खेती प्रारंभ किया। इससे उन्हे जैविक खाद एवं जैविक कीटनाषी का उपयोग कर अच्छा उत्पादन प्राप्त किया। उन्होंने भिण्डी को खरीफ धान फसल के मुख्य खेत में रोपाई के पहले दिन तक रखना प्रारंभ किया। जिससे उन्हे भिण्डी का बाजार में कीमत अधिक मिला। धान की नर्सरी तैयार हो जाने पर भिण्डी के पौधों को रोटावेटर से हरी खाद के रूप में भूमि में सरलतापूर्वक मिलाकर उसमें धान की रोपाई कर देते है। उस खेत में किसी प्रकार का रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशी प्रयोग नहीं करते।

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फसलों को सुरक्षित रखने नवाचार का प्रयोग, अन्य किसानों को करते है प्रेरित
खीरसागर पटेल ने पंखा एवं तेलटीना से फसल सुरक्षित रखने के लिए स्वयं एक मॉडल तैयार किया है। जिसको में खेत में जंगली जानवर बरिहा (सुअर), बंदर तथा पक्षियों को भगाने में उपयोग करते है। जिससे उनकी फसल को जंगली जानवरों से बहुत कम नुकसान होता है तथा खेत की देखरेख रात को नहीं करनी पड़ती। आज उनके द्वारा कृषि एवं उससे संबंधित समस्त नवेन्वेषी तकनीकों को अपनाकर देखते है एवं लाभ की स्थिति में समस्त ग्रामवासियों को भी इसे अपनाने को प्रेरित करते है। इन सभी तकनीकी एवं प्रेरणाओं के कारण 2019-20 में डॉ खुबचंद बघेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नवीन तकनीकियों के प्रयोग के माध्यम से कृषि करने के फलस्वरूप उनके पास दो ट्रैक्टर, एक बोलेरो एवं अपने परिवार के बच्चों को अच्छी शिक्षा हेतु शहरों में पढऩे के लिए प्रेरित कर रहे है, आज उनका परिवार खुशहाल है।

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