सारंगढ़। श्रीगोपाल जी मंदिर छोटेमठ में कार्तिक मास के पावन अवसर पर केसरवानी, अग्रवाल सहित विभिन्न समाजों की महिलाएं श्रद्धा और संकल्प के साथ अखंड दीप प्रज्वलित कर रही हैं। स्नान-दान पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाले इस दीपदान कार्यक्रम में महिलाएं मंदिर में विराजित श्रीगोपाल जी महाप्रभु, भगवान जगन्नाथ, श्री सीतानाथ भगवान, गोपेश्वर महादेव, अहिरावण मर्दन हनुमंत लला, राजराजेश्वरी मां एकनंदसा, मां पीतांबरा और गौ माता की कृपा प्राप्ति के लिए दीप अर्पित कर रही हैं।
मंदिर के महंत बंशीधर दास ने बताया कि यह धार्मिक परंपरा पिछले 11 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास एवं पुरुषोत्तम मास में महिलाएं अखंड दीप प्रज्वलित कर भगवान के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट करती हैं। इस आयोजन की विशेषता यह है कि महिलाएं आपसी समरसता और सहयोग की भावना के साथ स्वेच्छा से राशि एकत्र करती हैं और कार्तिक पूर्णिमा पर महंत को समर्पित करती हैं। इस राशि का उपयोग मंदिर के विकास एवं श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए किया जाता है।
महिलाओं के इस सामूहिक प्रयास से मंदिर में विकास कार्यों को भी गति मिली है। महंत बंशीधर दास के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में समर्पित कुल 90 हजार रुपये की राशि में से 70 हजार रुपये मंदिर परिसर में जल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बोर करवाने में लगाए गए। इससे मंदिर में पूजा-पाठ और भोग-प्रसाद की व्यवस्था के लिए पानी की सुविधा मिल रही है।
इसी तरह वर्ष 2025 में जमा राशि और श्रावण मास में आयोजित रुद्राभिषेक से प्राप्त 45 हजार रुपये को मिलाकर मां भगवती राजराजेश्वरी एकनंदसा जी के सम्मुख शेड के स्थान पर ढलाई कराने की योजना बनाई गई है। इससे मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
महंत की प्रेरणा से शुरू हुई इस पहल ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता की मिसाल भी पेश की है। पहले महिलाएं कार्तिक मास में व्यक्तिगत रूप से दीप जलाकर दान करती थीं, लेकिन अब विभिन्न समाजों की महिलाओं को एक सूत्र में जोड़कर सामूहिक रूप से अखंड ज्योति प्रज्वलित की जा रही है। इसका उद्देश्य प्रत्येक श्रद्धालु के हृदय में भगवान के प्रति श्रद्धा जगाना, आपसी सद्भाव को मजबूत करना और मंदिर के विकास में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
श्रीगोपाल जी मंदिर छोटेमठ में महिलाओं की यह पहल संदेश दे रही है कि सामूहिक आस्था, सहयोग और समर्पण से धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ जनसुविधाओं का विकास भी किया जा सकता है। दीपदान की यह परंपरा भक्ति, सामाजिक समरसता और सेवा भावना का सुंदर संगम बन रही है।
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