सारंगढ़-बिलाईगढ़:
बरमकेला विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला चाँटीपाली में शिक्षकों की गैर-हाजिरी और लचर प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर जब हमारी मीडिया टीम औऱ स्थानीय समाचार पत्रों ने जमीनी हकीकत उजागर की, तो पूरे महकमे में हड़कंप मच गया। लेकिन अपनी गंभीर लापरवाहियों पर जवाबदेही तय करने और व्यवस्था सुधारने के बजाय स्कूल प्रबंधन व संकुल समन्वयक द्वारा जो ‘डैमेज कंट्रोल’ का खेल रचा गया है, उसने शिक्षा व्यवस्था की कलई पूरी तरह खोल कर रख दी है।
हाल ही में यूट्यूब चैनल पर “चांटीपाली स्कूल में न्योता भोज सह अभिभावक बैठक” शीर्षक से प्रसारित वीडियो ने स्पष्ट कर दिया है कि कैसे अपनी गर्दन फंसती देख प्रबंधन ने आनन-फानन में निजी आयोजन और पालकों की ढाल बनाकर अपनी धूमिल छवि चमकाने की पटकथा लिखी।

ऑन-ड्यूटी वर्जन देने से इंकार, अब कैमरे के सामने धाराप्रवाह सफाई-
जब मीडिया की टीम दोपहर 3 बजे स्कूल परिसर पहुंची, तब प्रधान पाठक सहित नियमित शिक्षक नदारद थे। मौके पर मौजूद संकुल समन्वयक ने आधिकारिक जानकारी और उपस्थिति पंजी दिखाने से साफ इंकार कर दिया तथा नियमों की दुहाई देते हुए कहा कि “हमें उच्च अधिकारियों की अनुमति के बिना मीडिया को बयान देने का अधिकार नहीं है”। साथ ही कथित रूप से राजनीतिक रसूख की धौंस दिखाई गई।
यदि सरकारी सेवा नियमावली के तहत मीडिया को वस्तुस्थिति या दस्तावेज दिखाना मना था, तो फिर यूट्यूब चैनल के कैमरे के सामने घंटों बैठकर शाला की तारीफों के कसीदे पढ़ने और अखबार की खबर पर अनर्गल टिप्पणी करने की आधिकारिक अनुमति किसने दी? जब सच का सामना करना था तब नियम याद आए, और जब अपनी छवि बचानी थी तो सारा नियम-कायदा ताक पर रख दिया गया?
क्या यह गैर-हाजिरी की खुली स्वीकारोक्ति नहीं-
यूट्यूब वीडियो में खुद सफाई देते हुए यह कबूल किया गया कि प्रधान पाठक दोपहर 2:00 बजे तक स्कूल में थे और उसके बाद “आवश्यक कार्य” का हवाला देकर सारंगढ़/बरमकेला निकल गए।
बयान पर सवाल उठना लाज़मी है कि प्राथमिक शाला का निर्धारित समय क्या दोपहर 2 बजे तक ही होता है?
अगर प्रधान पाठक शाला समय समाप्त होने से पहले मुख्यालय या स्कूल छोड़कर गए, तो क्या उनके पास सक्षम अधिकारी (बीईओ) का विधिवत स्वीकृत मूवमेंट ऑर्डर या अवकाश आवेदन था?
बिना अवकाश दर्ज किए शाला अवधि में मुख्यालय छोड़ना ही तो ‘गैर-हाजिरी’ है, जिसे अखबार ने प्रमुखता से उठाया था!
न्योता भोज’— प्रशासनिक विफलता छुपाने की ढाल?
मीडिया अखबार में खबर छपने और उच्चाधिकारियों द्वारा जवाब-तलब किए जाने के ठीक बाद अचानक प्रधान पाठक को अपनी माताजी के जन्मदिन पर ‘न्योता भोज’ और उसी दिन ‘पालक बैठक’ की याद आई।
भोले-भाले पालकों को स्कूल में भोजन का न्योता देकर जुटाया गया और माहौल ऐसा तैयार किया गया मानो विद्यालय पूरे ब्लॉक में आदर्श स्थापित कर रहा हो। क्या यह शासकीय प्राथमिक शाला के गंभीर प्रशासनिक व वित्तीय आरोपों से ग्रामीणों और अधिकारियों का ध्यान भटकाने का सुनियोजित ‘पीआर स्टंट’ नहीं है?
सवालों से कब तक भागेगा निगरानी तंत्र?-
अखबार ने ग्रामीणों के हवाले से उजागर किया था कि स्कूल नियमित शिक्षकों के बजाय एक अतिरिक्त शिक्षिका के भरोसे चल रहा है और कागजों पर उपस्थिति दर्शाई जा रही है।
यूट्यूब पर चले प्रायोजित वीडियो में न तो उपस्थिति पंजी के उस दिन के रिकॉर्ड दिखाए गए, न ही दोपहर 3 बजे शाला में शिक्षकों की भौतिक अनुपस्थिति पर कोई तार्किक सफाई दी गई। केवल चुनिंदा पालकों के मुंह से “सब ठीक है” कहलवा देने से प्रशासनिक जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती।
निष्पक्ष जांच से सामने आएगा सच-
चाँटीपाली स्कूल के इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जब जिम्मेदार नुमाइंदों के पास तर्कों और दस्तावेजों का अभाव होता है, तो वे मीडिया और समाज की आंखों में धूल झोंकने के लिए ऐसे ही प्रायोजित आयोजनों का सहारा लेते हैं।
यदि स्कूल प्रबंधन और संकुल समन्वयक इतने ही पाक-साफ हैं, तो वे उच्चाधिकारियों के समक्ष उस दिन की उपस्थिति पंजी, मूवमेंट रजिस्टर और मध्यान भोजन स्टॉक का रिकॉर्ड सार्वजनिक करें। पालकों की आड़ लेकर खुद को पाक-साफ साबित करने की यह कवायद यह बताने के लिए काफी है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। अब देखना यह है कि जिला शिक्षा अधिकारी और स्थानीय प्रशासन इस लीपापोती पर संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच बिठाते हैं या रसूखदारों की यह पटकथा फाइलों में दबकर रह जाएगी।
हमारा अभियान जारी रहेगा’-
यदि हमारी निष्पक्ष, तथ्यपरक और नौनिहालों के भविष्य को समर्पित एक खबर से कुंभकर्णी नींद में सोया निगरानी तंत्र जागा है, संकुल समन्वयक व प्रधान पाठक की टीम में जवाबदेही का भय पैदा हुआ है और वे नियमित रूप से शाला में उपस्थित होने लगे हैं, तो यह पत्रकारिता की सबसे बड़ी जीत है।
हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि मीडिया प्रायोजित बयानों और कैमरों के सामने अपनी व्यक्तिगत ‘छवि सुधारने’ का जरिया नहीं है। अपनी साख बचाने की नौटंकी करने से कहीं बेहतर है कि स्कूल प्रबंधन और जिम्मेदार विभाग इन गरीब, मजदूर और बेबस पालकों के बच्चों की वास्तविक पढ़ाई पर ध्यान दें। सरकारी स्कूल ही गरीब मां-बाप का इकलौता सहारा हैं।शिक्षकों की लापरवाही और गैर-हाजिरी उनके बच्चों के सुनहरे भविष्य और मां-बाप के सपनों को चकनाचूर न करे, इसलिए जनहित में हमारी धारदार कलम बिना किसी दबाव या रसूख के अनवरत चलती रहेगी।
“पत्रकारिता का मकसद किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाना नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना है। यदि सच दिखाने पर प्रशासन में हलचल मची है और स्कूल की व्यवस्था पटरी पर लौटी है, तो ऐसे खुलासे आगे भी पूरी निडरता के साथ जारी रहेंगे।”
- न्योता भोज की आड़ में ‘दाग’ धोने की नाकाम कोशिश…चाँटीपाली स्कूल में गैर-हाजिरी पर घिरे प्रबंधन का ‘इवेंट मैनेजमेंट’ बेनकाब!तब सवालों से भागे संकुल समन्वयक और प्रधान पाठक ने साधी थी चुप्पी, अब प्रायोजित मंच सजाकर कैमरे के सामने परोस रहे सफाई.. - September 24, 2026
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