सारंगढ़। छत्तीसगढ़ की धरती को पर्वों और लोकसंस्कृति की धरती कहा जाता है, जहां हर त्योहार मिट्टी, कृषि, प्रकृति और रिश्तों से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसा ही एक अनूठा, पवित्र और लोकआस्था से परिपूर्ण पर्व है भोजली, जो भाई-बहन के अटूट प्रेम, अन्न के सम्मान और प्रकृति की समृद्धि का प्रतीक है। धार्मिक नगरी कोसीर में इस वर्ष भी भोजली पर्व को बड़े हर्षोल्लास, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया।
सावन माह में रक्षा बंधन के एक दिन बाद मनाया जाने वाला भोजली पर्व छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता और ग्रामीण परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। रविवार सुबह से ही गांव की गलियों में बाजे-गाजे, ढोल-मांदर की थाप और बहनों द्वारा गाए जा रहे पारंपरिक भोजली गीतों की मधुर गूंज सुनाई देती रही। पूरा गांव लोकपर्व के रंग में रंगा नजर आया।
भोजली पर्व की शुरुआत हरियाली अमावस्या के आसपास होती है। इस दिन किसान अपने खेत की उपजाऊ मिट्टी को एक छोटी टोकरी या मिट्टी के पात्र में लाते हैं, जिसे भोजली की टोकरी कहा जाता है। इसमें गेहूं, धान, जों और राई सहित अन्य अनाजों के बीज बोए जाते हैं। घर की महिलाएं और कुंवारी कन्याएं प्रतिदिन स्नान-ध्यान के बाद श्रद्धापूर्वक भोजली को जल अर्पित करती हैं और उसकी पूजा करती हैं।
लोकमान्यता है कि जैसे-जैसे भोजली के हरे-भरे अंकुर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का विस्तार होता है। अनाज के ये नन्हे अंकुर जीवन, उर्वरता, प्रकृति और अन्न देवता के प्रति आस्था के प्रतीक माने जाते हैं। रक्षा बंधन के दूसरे दिन इन पवित्र अंकुरों को भोजली के रूप में पूजकर विसर्जित किया जाता है। इस दौरान बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, वहीं भाई अपनी बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हैं। अन्न और मिट्टी की पूजा से जुड़ा होने के कारण भोजली पर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है।
कोसीर में पारंपरिक वेशभूषा में सजी-संवरी महिलाएं ढोल-मांदर की थाप पर लोकगीत गाते हुए निकलीं। सबसे पहले सभी श्रद्धालु और ग्रामीण गांव की ग्राम्य देवी मां कौशलेश्वरी देवी मंदिर पहुंचे, जहां विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान मंदिर परिसर “भोजली देवी की जय” के जयकारों से गूंज उठा।
गांव की सरपंच श्रीमती सुमन राव ने कहा कि भोजली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि हमारी मिट्टी, कृषि और लोकसंस्कृति से जुड़ी अमूल्य विरासत है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी तक इस परंपरा को पहुंचाना और इसे सहेजकर रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
पूजा-अर्चना के पश्चात बाजे-गाजे के साथ विशाल पारंपरिक शोभायात्रा बांधा तालाब पहुंची, जिसे कोसीर की जीवनदायिनी भी कहा जाता है। यहां पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ भोजली विसर्जन किया गया। इस अवसर पर गांव के गणमान्य नागरिक, बुजुर्ग, युवा और बड़ी संख्या में बच्चे मौजूद रहे। सभी ने एक-दूसरे को भोजली भेंट कर शुभकामनाएं और बधाई दी।
कोसीर में आयोजित भोजली पर्व ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराएं आज भी गांव की आत्मा में जीवित हैं। गांव की सरपंच सुमन राव द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सवों को समृद्ध बनाने के लिए की जा रही पहल की ग्रामीणों द्वारा सराहना की जा रही है। ऐसे आयोजन न केवल हमारी संस्कृति को जीवंत रखते हैं, बल्कि समाज में आपसी प्रेम, भाईचारे और एकता को भी मजबूत करते हैं।


