सारंगढ़। नगर समेत जिलेभर में इन दिनों जनजागरूकता का एक खूबसूरत दृश्य देखने को मिल रहा है। पुलिस स्कूलों तक पहुंच रही है और स्कूल भी बच्चों को लेकर थानों का भ्रमण करा रहे हैं। पुलिस बच्चों को अपराध से बचने की सीख दे रही है, वहीं थाना भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों को पुलिस व्यवस्था और कानून की कार्यप्रणाली से परिचित कराया जा रहा है। तस्वीरें भी आकर्षक होती हैं—कतार में बच्चे, सामने पुलिस अधिकारी, हाथों में मोबाइल और पीछे थाना भवन। लेकिन इस पूरी कवायद के बीच एक अहम सवाल खड़ा होता है—क्या हर उम्र के बच्चे के लिए थाना भ्रमण जरूरी है और यदि जरूरी है तो उसका उद्देश्य क्या है?
हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी के विद्यार्थियों को थाना भ्रमण कराना निश्चित रूप से उपयोगी हो सकता है। उन्हें एफआईआर की प्रक्रिया, साइबर अपराध, बाल अपराध, यातायात नियम, कानून और पुलिस की भूमिका के बारे में जानकारी दी जा सकती है। यह उनके लिए वास्तविक जीवन से जुड़ी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
लेकिन नर्सरी और प्राथमिक कक्षाओं के नन्हे बच्चों को थाने ले जाने के औचित्य पर विचार जरूरी है। चार-पांच वर्ष का बच्चा अपराध की प्रक्रिया या पुलिसिंग की कार्यप्रणाली को कितना समझ पाएगा? कहीं उसके लिए थाना केवल पुलिस की वर्दी, वाहन, वायरलेस और हथकड़ी देखने की जगह बनकर तो नहीं रह जाएगा? यदि उद्देश्य बच्चों को पुलिस से परिचित कराना है तो यह अच्छी पहल है, लेकिन इसे शिक्षा का नाम देने से पहले यह तय होना चाहिए कि बच्चे की उम्र के अनुरूप वह वहां से क्या सीखकर लौट रहा है।

जागरूकता की बात और जमीनी हकीकत
विडंबना यह है कि पुलिस स्कूलों में जाकर बच्चों को गुड टच-बैड टच, साइबर ठगी, नशे के खतरे, यातायात नियम और अपराध से बचाव की जानकारी दे रही है। दूसरी ओर समय-समय पर स्कूलों से शिक्षकों के नशे की हालत में पहुंचने, अभद्र व्यवहार, अनुशासनहीनता और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों की खबरें सामने आती हैं। नाबालिगों के यातायात नियमों की अनदेखी से लेकर हिंसक घटनाओं और लूट जैसी वारदातों में उनकी संलिप्तता की खबरें भी चिंता बढ़ाती हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पुलिस कितने स्कूलों में पहुंची? असली सवाल यह है कि पुलिस की बात बच्चों के व्यवहार में कितनी उतरी?
यह सवाल स्कूल प्रबंधन से भी उतना ही बड़ा है। बच्चों को गुड टच और बैड टच बताना जरूरी है, लेकिन गुड कंडक्ट कौन सिखाएगा? साइबर अपराध से बचाव जरूरी है, नशे से दूर रखना जरूरी है और यातायात नियम समझाना भी जरूरी है। मगर बच्चों के सामने बड़ों का आचरण भी उनकी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यदि शिक्षक ही अनुशासन की सीमाएं तोड़ें, स्कूल परिसर में बच्चों की सुरक्षा पर सवाल उठें या शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाए, तो पुलिस की जागरूकता कक्षा कितनी प्रभावी होगी? बच्चे केवल भाषण नहीं सुनते, वे अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से भी सीखते हैं।
असली जागरूकता रोज की पाठशाला में
स्कूल की असली जागरूकता कक्षा चार दीवारों के भीतर रोज चलती है—शिक्षक के व्यवहार से, प्रबंधन की संवेदनशीलता से और शिकायत मिलने पर तत्काल कार्रवाई से।
थाना पिकनिक स्पॉट नहीं है। पुलिस थाने में अपराध पीड़ित आते हैं, शिकायतें दर्ज होती हैं, आरोपी आते हैं, कानूनी कार्रवाई होती है और कई बार गंभीर मामलों की जांच चलती रहती है। इसलिए बच्चों का थाना भ्रमण उनकी उम्र, उद्देश्य और संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए।
नन्हे बच्चों के लिए स्कूल में ही पुलिस अधिकारियों को बुलाकर सुरक्षा और कानून की सरल जानकारी देना अधिक उपयोगी हो सकता है। किशोर विद्यार्थियों को थाना की कार्यप्रणाली समझाई जा सकती है। वहीं बड़े विद्यार्थियों के साथ साइबर अपराध, कानून, बाल अपराध और नशे जैसी वास्तविक चुनौतियों पर संवाद किया जा सकता है।
थाना दिखाना नहीं, कानून समझाना जरूरी
थाना दिखाना महत्वपूर्ण नहीं, कानून समझाना महत्वपूर्ण है। जागरूकता की असली परीक्षा फोटो या कार्यक्रमों की संख्या नहीं, बल्कि उसका परिणाम है।
पुलिस और स्कूलों को मिलकर यह देखना चाहिए कि उनके जागरूकता अभियानों का वास्तविक प्रभाव क्या पड़ा। कितने बच्चे साइबर ठगी से बच पाए? कितने नाबालिगों ने यातायात नियमों का पालन शुरू किया? कितने बच्चों ने नशे से दूरी बनाई? कितने बच्चों को सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श की सही जानकारी हुई? कितनी शिकायतों पर स्कूलों ने तत्काल कार्रवाई की? और सबसे बड़ा सवाल—क्या बच्चों में कानून के प्रति सम्मान बढ़ा?
यदि इन सवालों के जवाब तलाशे बिना केवल कार्यक्रमों की संख्या बढ़ती रही तो जागरूकता अभियान भी सरकारी कैलेंडर की एक गतिविधि बनकर रह सकते हैं।
पुलिस को समझना होगा कि हर थाना भ्रमण उपलब्धि नहीं होता, और स्कूलों को भी समझना होगा कि हर शैक्षणिक भ्रमण शिक्षा नहीं होता।
बच्चों को थाने ले जाने से पहले यह तय होना चाहिए कि उनकी उम्र के अनुसार उन्हें वहां क्या सिखाया जाना है। वहीं बच्चों को अपराध से बचाने की सीख देने से पहले स्कूलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चा अपने स्कूल में भी उतना ही सुरक्षित महसूस करे, जितना पुलिस उसे समाज में सुरक्षित रहने का पाठ पढ़ाती है।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि पुलिस स्कूल क्यों जा रही है और स्कूल थाना क्यों जा रहा है? असली सवाल यह है कि पुलिस और स्कूल मिलकर बच्चों को वह सुरक्षित समाज कब देंगे, जिसके लिए आज दोनों एक-दूसरे के यहां विजिट कर रहे हैं?
वरना आने वाले समय में समाज यह पूछने को मजबूर होगा—पुलिस स्कूल में जागरूकता बांट रही थी, स्कूल थाने में घूम रहा था, फिर अपराध की खबरें बच्चों तक पहुंच कैसे गईं?
जनजागरूकता का दीप जलाना अच्छी बात है, लेकिन अब यह भी देखना होगा कि उसकी रोशनी जमीन तक पहुंच रही है या सिर्फ कैमरे के फ्लैश तक।
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