सारंगढ़। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा सारंगढ़ स्थित आशा निकेतन वृद्धाश्रम में स्तनपान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में महिला एवं बाल विकास अधिकारी, परियोजना अधिकारी, सेक्टर सुपरवाइजर, सुपरवाइजर सहित विभागीय कर्मचारी एवं महिलाएं उपस्थित रहीं। प्रशिक्षकों ने वीडियो प्रदर्शन एवं व्यावहारिक जानकारी के माध्यम से माताओं को शिशु को सही तरीके से स्तनपान कराने की जानकारी दी।
महिला एवं बाल विकास अधिकारी ने निर्देशित किया कि कार्यक्रम में मिली महत्वपूर्ण जानकारी को जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से शिशुवती महिलाओं तक पहुंचाया जाए, ताकि माताओं को स्तनपान के महत्व और सही तरीके की जानकारी मिल सके।

मां का दूध शिशु के लिए पहला टीका
कार्यक्रम में बताया गया कि स्तनपान प्राकृतिक प्रक्रिया जरूर है, लेकिन मां और शिशु दोनों के लिए इसे सहज बनाने में समय और अभ्यास की आवश्यकता होती है। मां का दूध शिशु को आवश्यक पोषण, ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है। यही कारण है कि स्तनपान को शिशु के स्वस्थ विकास की सबसे मजबूत नींव माना जाता है।
विशेषज्ञों ने बताया कि जन्म के पहले एक घंटे के भीतर नवजात को स्तनपान कराना बेहद महत्वपूर्ण है। जन्म के तुरंत बाद निकलने वाला गाढ़ा और अक्सर सुनहरे रंग का पहला दूध ‘कोलोस्ट्रम’ कहलाता है। यह मात्रा में कम होने के बावजूद महत्वपूर्ण एंटीबॉडी से भरपूर होता है और नवजात की शुरुआती रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है।
छह माह तक केवल मां का दूध
कार्यक्रम में बताया गया कि जन्म से छह माह की उम्र तक शिशु को मां के दूध से ही आवश्यक पोषण मिल सकता है। इस अवधि में पानी सहित अन्य खाद्य या तरल पदार्थ देने की आवश्यकता नहीं होती। छह माह पूरे होने के बाद बच्चे को स्तनपान के साथ नरम एवं उपयुक्त आहार देना शुरू किया जा सकता है और स्तनपान दो वर्ष या उससे अधिक समय तक जारी रखने की सलाह दी गई।
जन्म के तुरंत बाद शिशु को मां की त्वचा से त्वचा का संपर्क देने से बच्चे को गर्माहट मिलती है और मां-शिशु के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है। इससे शुरुआती स्तनपान में भी मदद मिलती है।
बच्चे की भूख के संकेत पहचानें
माताओं को सलाह दी गई कि शिशु के लिए स्तनपान का कोई कठोर समय निर्धारित न करें। जब भी बच्चा भूख के संकेत दे, उसे स्तनपान कराया जाए। इसे ‘रिस्पॉन्सिव फीडिंग’ कहा जाता है। इससे बच्चे को पर्याप्त दूध मिलने के साथ मां के दूध का उत्पादन भी उसकी जरूरत के अनुसार बढ़ने में मदद करता है।
एक स्तन से पर्याप्त दूध पीने के बाद दूसरे स्तन से दूध पिलाने की सलाह दी गई। यदि बच्चा बार-बार स्तनपान करते समय सो जाता है, तो उसके हाथ-पैर को हल्के से स्पर्श करना, उससे बात करना या गाना गाना तथा स्तनपान की स्थिति बदलना उपयोगी हो सकता है।
मां भी रखे अपने स्वास्थ्य का ध्यान
स्तनपान कराने वाली माताओं को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की सलाह दी गई। शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए सामान्य तौर पर दिनभर पर्याप्त तरल पदार्थ लेते रहना जरूरी है। मां का स्वस्थ रहना भी सफल स्तनपान के लिए महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि यदि किसी कारण से मां सीधे स्तनपान नहीं करा पा रही है तो हाथ या उपयुक्त उपकरण की सहायता से दूध निकालकर सुरक्षित तरीके से बच्चे को दिया जा सकता है। साथ ही, बिना चिकित्सकीय सलाह के बोतल और पैसिफायर के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी गई।
परिवार और समाज का सहयोग जरूरी
वक्ताओं ने कहा कि स्तनपान केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है। स्तनपान कराने वाली महिला को परिवार, पति, स्वास्थ्यकर्मियों, कार्यस्थल और पूरे समाज के सहयोग की आवश्यकता होती है। सही जानकारी और सहयोग मिलने पर मां अपने शिशु को जीवन की स्वस्थ शुरुआत देने में अधिक सक्षम हो सकती है।
महिला एवं बाल विकास विभाग ने सभी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और संबंधित कर्मचारियों से अपील की कि वे गांव-गांव पहुंचकर माताओं को शुरुआती स्तनपान, छह माह तक केवल मां का दूध और छह माह बाद पूरक आहार के संबंध में लगातार जागरूक करें।




