सारंगढ़-बिलाईगढ़। कुष्ठ रोग को लेकर समाज में आज भी कई तरह की भ्रांतियां और गलत धारणाएं मौजूद हैं, जबकि इसकी पहचान अपेक्षाकृत आसान है। पूर्व सीएमएचओ डॉ. एफ. आर. निराला ने कहा कि यदि लोग सजग रहें और शरीर पर दिखाई देने वाले सुन्नपन वाले दाग-धब्बों को गंभीरता से लें, तो कुष्ठ रोग की समय रहते पहचान कर उसका पूर्ण उपचार संभव है।
डॉ. निराला के अनुसार, कुष्ठ रोग का उल्लेख प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ सुश्रुत संहिता और चरक संहिता में भी मिलता है। भारत सरकार ने वर्ष 1955 में राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की थी। बाद में 1983 में बहु-औषधि चिकित्सा (एमडीटी) उपलब्ध होने के बाद इसे राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम का स्वरूप दिया गया। कुष्ठ रोग, जिसे हेनसन डिजीज भी कहा जाता है, माइकोबैक्टीरियम लेप्री नामक जीवाणु से होता है, जो मुख्य रूप से त्वचा और तंत्रिकाओं को प्रभावित करता है। यह रोग जानलेवा नहीं है, लेकिन समय पर उपचार न मिलने पर आंख, हाथ और पैरों में स्थायी विकलांगता का कारण बन सकता है।
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में कुष्ठ रोग के मामले अपेक्षाकृत अधिक पाए जाते हैं। रायगढ़, महासमुंद, जांजगीर-चांपा, बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग जैसे क्षेत्र अधिक प्रभावित हैं। महानदी के तटीय इलाकों से लेकर बिलाईगढ़, सारंगढ़ और बरमकेला तक का नम वातावरण जीवाणु के लिए अनुकूल माना जाता है, जिसके कारण सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में भी रोग के मामले अधिक सामने आते हैं।
कुष्ठ रोग की पहचान में सबसे महत्वपूर्ण संकेत सुन्नपन वाला दाग है। शरीर पर सफेद या लाल रंग का ऐसा दाग जिसमें संवेदना समाप्त हो जाए, सुई चुभाने या स्पर्श करने पर दर्द महसूस न हो, तो यह कुष्ठ का संकेत हो सकता है। इसके अलावा प्रभावित हिस्से में पसीना न आना, कोहनी, घुटने, कान या माथे की नसों का मोटा होना, हाथ-पैर की उंगलियों का मुड़ना, तलवों में दर्दरहित घाव बनना, चप्पल का बार-बार निकल जाना तथा भौंहों का झड़ना और आंखों का पूरी तरह बंद न होना भी इसके प्रमुख लक्षण हैं।
डॉ. निराला ने बताया कि कुष्ठ रोग खांसने और छींकने के दौरान निकलने वाली बूंदों के माध्यम से फैल सकता है। लंबे समय तक बिना उपचार वाले मरीज के संपर्क में रहने पर संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि रोग नियंत्रण के लिए नेतृत्व और जनप्रतिबद्धता, घर-घर सक्रिय खोज अभियान, गुणवत्तापूर्ण जांच, सामाजिक कलंक को समाप्त करना तथा डिजिटल रिपोर्टिंग जैसे पांच प्रमुख स्तंभों पर लगातार कार्य किया जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य प्रति 10 हजार आबादी पर एक से कम मरीज, बच्चों में नए मामलों को शून्य करना, ग्रेड-2 विकलांगता को समाप्त करना और समाज से भेदभाव की भावना को खत्म करना है। इसके लिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, संदिग्ध मामलों की त्वरित जांच, अस्पतालों में स्पर्श क्लीनिक, मदर केस की पहचान तथा संपर्क में आए लोगों को पीईपी दवा उपलब्ध कराने जैसे प्रयास किए जा रहे हैं।
डॉ. निराला ने कहा कि कुष्ठ उन्मूलन में पंचायतों, स्कूलों, स्वास्थ्य कर्मियों, मितानिनों और आम नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि बच्चों को प्रारंभिक स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता दी जाए और समाज में भेदभाव की भावना समाप्त की जाए, तो “कुष्ठ मुक्त पंचायत” का सपना जल्द साकार किया जा सकता है।

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