सारंगढ़। भ्रष्टाचार और सरकारी बाबूशाही जब अपनी औकात पर उतरती है, तो एक आम गरीब मैकेनिक के पसीने की कमाई भी सरकारी तिजोरियों और साहबों की नीयत के बीच दम तोड़ देती है। ताजा और बेहद शर्मनाक मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के वन मंडलाधिकारी (DFO) डिवीजन ऑफिस का है। जिस मैकेनिक ने दिन-रात एक करके, करंट का खतरा मोल लेकर वन विभाग के दफ्तरों, DFO बंगले और SDO बंगले को अपनी मेहनत से रोशन किया, आज वही मैकेनिक मनोज जायसवाल अपनी ही पाई-पाई के लिए कड़कड़ाती धूप में इन दफ्तरों की धूल फांक रहा है।

कुल ₹1,56,570 का भुगतान दबाकर बैठे वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की पोल तब खुली, जब पानी सिर से ऊपर चला गया और पीड़ित ने कलेक्टर की ‘जनदर्शन’ अदालत में न्याय की भीख मांगी।
फिल्मी स्टाइल में खेला गया टालमटोल का खेल-
कटेली ग्राम के रहने वाले पीड़ित बिजली मैकेनिक मनोज जायसवाल ने अपनी शिकायत में जो आपबीती सुनाई है, वह सरकारी सिस्टम के चरित्र को बेनकाब करती है।
साल 2023: पीड़ित ने डिवीजन ऑफिस, DFO और SDO बंगले में बिजली फिटिंग का काम किया। बिल बना ₹1,72,350, लेकिन ‘राजू सिदार रेंजर’ ने सिर्फ ₹59,000 देकर बाकी रकम बाद में देने का झुनझुना थमा दिया।
साल 2024-25 मे इसके बाद साहबों ने फिर काम कराया। प्रथम तल, बाबू क्वार्टर, टमटोरा रेस्ट हाउस में AC फिटिंग और रिपेयरिंग के काम जोड़कर कुल बिल ₹2,85,570 तक पहुंच गया।
कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा भुगतान?
पीड़ित को अब तक महज ₹1,29,000 ही दिए गए। जब मैकेनिक ने तत्कालीन SDO चंद्राकर और अजय रेंजर से अपने बाकी पैसे मांगे, तो वे जून-जुलाई 2025 तक टालते रहे। जैसे ही दोनों का ट्रांसफर हुआ, साहबों की नीयत बदल गई। अब वे न फोन उठाते हैं और न ही व्हाट्सएप मैसेजों का कोई जवाब देते हैं।
सरकारी दस्तावेज खुद चिल्ला रहे हैं साहबों की मक्कारी!
कलेक्टर जनदर्शन की फटकार के बाद वन विभाग ने ‘अधीक्षक, गोमर्डा अभयारण्य सारंगढ़’ से जांच कराई। अधीक्षक ने 22.12.2025 को सौंपी अपनी रिपोर्ट में साफ शब्दों में लिखा
“शिकायतकर्ता मनोज जायसवाल द्वारा कार्यों का संपादन किया गया था। किन्तु तत्कालीन परिक्षेत्र अधिकारियों की लापरवाही, टालमटोल से आज दिनांक तक उन्हें भुगतान प्राप्त नहीं हुआ है।”
बड़ा सवाल-
जब विभाग खुद मान रहा है कि मैकेनिक ने काम किया और अधिकारियों ने लापरवाही की, तो उन दोषी अफसरों को तुरंत सस्पेंड कर उनके वेतन से रिकवरी क्यों नहीं की गई?
‘दोषी अफसरों से वसूली’ का झांसा देकर केस रफा-दफा करने की इतनी हड़बड़ी क्यों?
इस पूरे मामले में वन विभाग की नीयत पर सबसे बड़ा और तीखा सवाल तब खड़ा होता है, जब वन मंडलाधिकारी कार्यालय द्वारा कलेक्टर को भेजे गए पत्र क्रमांक/शिका./5745 (दिनांक 26/12/2025) को देखा जाए।
एक तरफ विभाग कहता है कि दोषी अधिकारियों/कर्मचारियों से नियमानुसार वसूली करके मैकेनिक को भुगतान किया जाएगा। लेकिन, इसी पत्र के आखिरी पैराग्राफ में विभाग कलेक्टर से गुहार लगा रहा है कि “इस प्रकरण को नस्ती बद्ध (फाइल क्लोज) किया जाए और जनदर्शन के पोर्टल से विलोपित (डिलीट) कर दिया जाए।”
जनता पूछती है –
जब तक गरीब मैकेनिक के बैंक खाते में उसकी पूरी बकाया राशि (₹1,56,570) ट्रांसफर नहीं हो जाती, तब तक फाइल बंद करने की इतनी छटपटाहट क्यों है?
क्या ‘जनदर्शन पोर्टल’ से शिकायत को डिलीट कराने के पीछे का मकसद उच्च अधिकारियों की चमड़ी बचाना और मामले को ठंडे बस्ते में डालना है?
क्या ट्रांसफर हो चुके ‘साहबों’ के रसूख के आगे विभाग घुटने टेक चुका है?
साहबों के बंगले रोशन, गरीब के घर में अंधेरा-
सरकारी विभागों में छोटे ठेकेदारों और मजदूरों का भुगतान अटकाना एक आम बीमारी बन चुका है। साहब AC की हवा खाते हैं और मैकेनिक अपने खून-पसीने की कमाई के लिए दफ्तर के बाबू से लेकर कलेक्टर तक के चक्कर काटता है। अगर सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला प्रशासन ने इस मामले में केवल ‘कागजी फाइल’ बंद करने का खेल खेला, तो यह न्याय का कत्ल होगा। मनोज जायसवाल को आश्वासन नहीं, उसका पूरा पैसा ब्याज समेत मिलना चाहिए, और ‘लापरवाह’ अफसरों को सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए।
अधिकारी मिडिया का नही उठाते फोन –
अनुविभागीय अधिकारी (SDO) अंकित पांडेय द्वारा मीडिया का फोन न उठाना कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह उस सामंती और बेलगाम ‘साहब संस्कृति’ का हिस्सा है जहां अधिकारी खुद को जनता और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से ऊपर समझने लगते हैं। जब जनता के सवालों का जवाब देने और अपनी जिम्मेदारी निभाने की बारी आती है, तो ये ‘साहब’ अपने कमरों में दुबक कर फोन रिसीव करना भी मुनासिब नहीं समझते।
मीडिया का फोन न उठाना सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि अधिकारी के पास इस महाघोटाले और गरीब के शोषण पर पर्दा डालने के अलावा कोई ठोस जवाब नहीं है। यह केवल एक फोन कॉल को नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता के मुंह पर करारा तमाचा है।
उच्च अधिकारियों और जिला प्रशासन को इस गंभीर उदासीनता और वीआईपी रवैये का तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। अगर सरकारी कुर्सी पर बैठकर जनता के प्रति इतनी बेरुखी दिखाई जाएगी, तो आम आदमी का इस सड़ चुके सिस्टम से भरोसा उठना तय है। क्या कलेक्टर महोदय ऐसे गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की इस ‘चुप्पी’ पर नकेल कसेंगे, या फिर मौन रहकर इस शहशाही रवैये को अपनी मूक सहमति देंगे?

